Wednesday, 31 October 2012

समाज का शोषण कोई करे दोष सवर्णों पर !


                   सवर्णों  का   क्या  दोष ?

    इस  देश  का आम आदमी कहॉं जाए अपनी पीड़ा किसे सुनावे ?जो न हिंदू और न ही मुशलमान है न हरिजन और न ही सवर्ण है।न स्त्री न ही पुरुष  है। न बच्चा न बूढ़ा है।वो केवल इंसान है। अब तो उसका भी जीना मुश्किल है।

       गरीब हो या अमीर, भूखप्यास, सुख दुख, बीमारी आरामी, शिक्षा दीक्षा आदि सभी प्रकार की सुख सुविधाएँ तो सबको चाहिए किंतु ये आज भारतवर्ष  की सच्चाई नहीं है। राजनेता जो जनता के वोट पाकर विधायक, सांसद,मंत्री आदि सब कुछ बनते हैं।उन्होंने ही आम जनता को अपने से कितनी दूर कर दिया है?यह बेहद शर्म की बात है। एक तो संपन्नवर्ग जो अपनी कमाई का जैसे भी उपयोग करे स्वतंत्र है। यद्यपि छोटे लोंगों की मदद के लिए उसे भी उदारता दिखानी चाहिए।
   
     नेता जी !आपकी पार्टियों में सांसद, मंत्री आदि नेता ही होते हैं आम आदमी क्यों नहीं?और यदि किसी नेता ने उदारता वश  आम आदमी को बुला भी लिया या उसके यहॉं चला भी गया तो यह आम और खास की दूरी साफ दिखती है।जैसे किसी कॅंगले पर कृपा की जा रही हो।यह दूरी किस आरक्षण  से पाटोगे?  

 नेता जी -                   आप वो फिल्टर्ड पानी पीते हैं ?
आम आदमी -    आम आदमी को आम पानी भी

पीने को मुश्किल से  मिलता है। 

नेता जी- आपका राशन बहुमूल्य ब्रांडेड होता है?              

 आम आदमी - आम आदमी के लिए जो संभव हो वही ठीक है आखिर पेट तो भरना ही है।

नेता जी -आप एयरकंडीशंड कोच में सफर करते हैं ?   आम आदमी-आम आदमी के लिए जनरल कोच में भी जगह नहीं होती।

नेता जी-आप पंच सितारा होटलों के भोग भोगते हैं?    आम आदमी-आम आदमी को तारे गिनकर रातें बितानी पड़ती हैं।   

नेता जी- आप महॅंगी महॅंगी गाड़ियों पर घूमते हो?     आम आदमी-आम आदमी तॉंगे के लिए तरसते हैं।हमारे कुछ भाई तो रिक्सा खींचते भी हैं।
 नेता जी-आपके बच्चे महॅंगे स्कूलों में पढ़ते हैं?          
आम आदमी-आम आदमी के बच्चे कहीं भी पढ़ लेंगे।आखिर पढ़ना ही है।
 नेता जी-आप जो कपड़े उतार कर फेंक देते हैं ?        
आम आदमी -आम आदमी को वो नसीब नहीं होतेहैं ?
 नेता जी- आपका इलाज विदेशों  में होता है?              आम आदमी-आम आदमी का इलाज कहीं भी चलेगानेता जी-आप एयर कंडीशंड बॅंगलों में सोते हैं?          
आम आदमी-आम आदमी के लिए सोने को कमर नहीं है। 

नेता जी-    आप जहाज से चलते हैं?                      
आम आदमी-आम आदमी नजदीक से जहाज देखने को भी तरसते हैं। 
   आपको देख देख कर आपके सरकारी कर्मचारी वर्ग का तो अपने से ही भरोसा उठ  सा गया है।सरकारी विद्यालयों के अध्यापक अपने बच्चों को सरकारी विद्यालयों में क्यों नहीं पढ़ाते हैं ?सरकारी डाक्टर अपना और अपनों का इलाज प्राइवेट हॉस्पिटल्स में क्यों करवाते हैं?अपने देश के नेता अपना इलाज कराने विदेशों में क्यों जाते हैं? 

सरकारी विद्यालयों में बॅंटने वाला भोजन वहॉं के अध्यापक भी क्यों नहीं खाते हैं?
जनरल कोच में बैठ कर क्यों नहीं चलते हैं नेता जी?

आम जनता वाला पानी क्यों नहीं पीते नेता जी ?
आपके बच्चे महॅंगे स्कूलों में पढ़ते हैं । आम आदमी के बच्चों के साथ अपने बच्चों को क्यों नहीं पढ़ाते नेता जी?
आम आदमी के साथ गॉंवों में क्यों नहीं रहते हैं नेता जी ?
हमारे साथ आम सवारियों में क्यों नहीं चलते हैं नेता जी?
आम आदमी के साथ आम जगहों पर इलाज क्यों नहीं कराते हैं नेता जी?
आम आदमी को जहाज की सैर क्यों नहीं कराते हैं नेता जी?
आम आदमी को एसी में सोने की व्यवस्था क्यों नहीं है नेता जी?
यदि इलाज विदेशों में ही ठीक होता है तो आम आदमी के इलाज में लापरवाही क्यों?आप अपनी पार्टियॉं सांसद, मंत्री आदि नेताओं के साथ मनाते हैं आम आदमी के साथ क्यों नहीं?

आम आदमी से छिपाकर विदेशों पैसा रखते हैंआप ?

किस मुख से आरक्षण एवं समता की बात करते हैं आप ? 

    गरीबत सवर्ण और असवर्ण दोनों में ही  है।दोनों ही आम जीवन जीते हैं इसलिए दोंनों के बच्चे साथ साथ पढ़ते हैं दोनों का इलाज एक जैसे हॉस्पिटल में होता है।दोनों एक जैसे ढाबे में खाना खाते हैं दोनों एक जैसे जनरल कोच में साथ साथ बैठकर यात्रा करते हैं।दोनों के पास एसी नहीं होता।दोनों ही वर्ग  आकाश  में  उँगली से  इशारा  करके ही बच्चों को   उड़ता हुआ जहाज दिखाकर अपनी एवं अपने बच्चों की  जिंदगी काट लेते हैं।ऐसे अधिकांश  दोनों लोगों का जीवन गॉंव में ही बीतता है।दोनों ही गाडियों पर बैठने के लिए तरसते हैं किसी नेता की गाड़ी आती देखकर सवर्ण और असवर्ण दोनों और उनके बच्चे देखने के लिए दौड़ पड़ते हैं।कृषि  कार्य से लेकर सब काम दोनों के एक जैसे एक साथ होते हैं पार्टियॉं भी दोनों की एक जैसी एक साथ होती हैं।
     जिन सवर्ण और असवर्ण लोगों की जीवन शैली में इतनी समानता है।उन्हें आपस में तोड़ने की साजिश करते हैं नेता जी! आपके साथ जिन सवर्ण और असवर्ण दोंनों ही वर्गों का कहीं कोई मेल नहीं खाता है

 नेताओं और आमआदमी की जीवन शैली में इतनी विषमता है  ।उन वर्गों की बात किस मुख से करते हैं नेता जी? 

   जाति संप्रदायगत आरक्षण 

    गरीबों के पास और कुछ नहीं बचा है गरीब लोगों का सब कुछ नेताओं ने छीन सा लिया है।एक मात्र भाईचारा बचा है जिसके सहारे दोनों वर्ग अपने सुख दुख एक दूसरे के साथ बॉंट लेते हैं। जिस बल पर गरीबत में भी गौरवपूर्ण जीवन जी लेते हैं दोनों वर्ग।वह भी छीनने का प्रयास! इतनी चालाकी ! तुम्हें धिक्कार है।

    तुम चाहते तो गरीबों के साथ खड़े होकर उनका भी नसीब सुधारने में सहयोगी बन सकते थे। हर गरीब की शैक्षणिक गुणवत्ता बढ़ाने में सहायक हो सकते थे आप, किंतु आपने हमेंशा  अपने से अलग रखा गरीबों को!
     जहॉ तक छुआछूत की बात है उसमें महर्षि मनु कहीं कारण नहीं हैं वो तो एक ऋषि थे अपनी बात लिखी आगे बढ़ गए किसी युग का वो सच रहा होगा हो सकता है तब ये सब प्रासंगिक रहा हो। महर्षिमनु किसी  के सामने कभी लट्ठ लेकर खड़े हुए हों या किसी युग में सवर्णों द्वारा कोई सामूहिक आंदोलन छुआछूत के समर्थन में चलाया गया हो या किसी भी रूप में असवर्णों के विरोध में चलाया गया हो ऐसा कोई इतिहास प्रमाण नहीं मिलता है।हमारी बात मानना ही पड़ेगा ऐसा किसी ने कहा हो तो ये उसकी निजी बात है।यदि ऐसा हुआ भी हो तो असवर्ण वर्ग के लोगों को इतना डरपोक क्यों सिद्ध करने का प्रयास किया रहा है कि वो मुट्ठी भर सवर्णों के  सामने भय वश झुक गए होंगे उन्हें इतने नीचे क्यों गिराया जा रहा है?कम से कम जो कुछ हुआ होगा  असवर्णों ने अपने होश  हवाश  में स्वीकार किया होगा कारण जो भी रहे हों। वो जॉंच का विषय हो सकता है।
     दूसरी बात सवर्णों ने असवर्णों को अछूत घोषित कर दिया। यह बात भी सच इसलिए नहीं लगती है कि वही मुट्ठी भर सवर्ण लोग  बहुसंख्यक असवर्णों को अछूत घोषित कर देने वाले कौन होते थे ?इस विषय में किसी की बात कोई मान भी क्यों लेगा?वह भी वह वर्ग जो संख्या बल में सवर्णों से अधिक बलवान है।और यदि सवर्णों ने ऐसा किया भी हो तो असवर्णों को स्वाभिमान से काम लेना चाहिए था।

       यदि ऐसा हुआ भी था तो  असवर्ण लोग  अपना कुनबा अलग बनाकर सवर्णों को अछूत घोषित कर सकते थे और अपने शादी व्याह आदि काम काज अपने ही विशाल वर्ग में करके सवर्णों के समानांतर या उससे भी अच्छी एक रेखा और खींच सकते थे। यदि सवर्ण कभी एहसास करते तो समझौता बराबरी पर होता और यदि न होता तो न होता। असवर्ण आखिर लालायित थे ही क्यों ? जबकि आवश्यकता तो दोनों को  दोनों की बराबर ही रही होगी।आखिर असवर्णों को सवर्णों पर बोझ सिद्ध करने के प्रयास क्यों हो रहे हैं ? वर्तमान आरक्षण नीति भी उसीप्रकार का एक प्रयास है ।यदि किसी का मन गिराकर उसे धन दिया जाय तो कोई आँखें कैसे मिला सकेगा ?साठ सालों से भिखारी सिद्ध किया किंतु दिया क्या गया ?ईमानदारी से सरकार ने बिना आरक्षण के ही अपना दायित्व निभाया होता तो क्यों कोई वर्ग आरक्षण जैसा अपमान जनक लेवल लगाकर अपनी दालरोटी का यत्न करना स्वीकार करता ?इस देश का असवर्ण भी अत्यंत परिश्रमी वर्ग से है स्वस्थ है उसे स्वाभिमानी एवं स्वकर्म पर गर्व करना चाहिए।नेताओं की लोभ भरी बातों पर कभी भरोसा नहीं करना चाहिए।आजादी मिले साठ साल हो गए मिलना होता तो बहुत कुछ मिल चुका होता ।स्विस बैंक भरे  गए और क्या हुआ ? 

        वर्तमान पीढ़ी के लोग महर्षि मनु  का सम्मान करने के लिए छुवाछूत पृथा का परंपरा के रूप में पालन कर रहे होंगे यह विश्वास करने योग्य नहीं है। जो पीढ़ी अपने माता पिता की बात मानने में कतराने लगी  हो वो मनु की बात क्यों  मानेगी? इस पर कोई भी पढ़ा लिखा वर्ग विश्वास नहीं करेगा। यदि उसका कोई निजी स्वार्थ नहीं है तो।जैसे नेताओं को होता है।सैकड़ों वर्षों तक परतंत्र रहे देश में  सवर्णों को अपना विकास करने के लिए कोई विशेषाधिकार प्राप्त था क्या ?अकारण किसी को बदनाम करने की परम्परा ठीक नहीं है ।

     इस तथाकथित  न्योछावर (आरक्षण) से असवर्णों का गौरव एक बार फिर गिराया गया है।उनकी परिश्रम से अर्जित की हुई शिक्षा,संपत्ति, नौकरी,जगह जमीन आदि सब कुछ फ्री में मिली  है।ऐसा ही मानेंगे लोग! आज लोग आरक्षण के द्वारा नियुक्त किए गए डाक्टरों से अपना इलाज नहीं करवाना चाहते हैं। अरे नेताओं! आपने तो असवर्णों की शिक्षा,संपत्ति, नौकरी आदि योग्यता पर हमेंशा  के लिए प्रश्न  चिन्ह लगा दिया है!
       आरक्षण किसी और के भाग का न्यायिक हिस्सा है।उसे कोई और भोगकर स्वाभिमानी कैसे कहा जा सकता है।हॉं, यदि उस वर्ग ने कभी किसी का हिस्सा हरण किया है।तब तो परस्व हरण को स्वाधिकार समझा जा सकता है।अन्यथा किसी वर्ग विशेष  की गरीबत मिटाने का यह ठीक ढंग नहीं है।करना भी था तो आरक्षण का आधार आर्थिक होता तो फिर भी न्याय कहा जा सकता था।जातिगत आरक्षण काल्पनिक प्रतिशोध की ज्वाला से कल्पित है।इसलिए इसे न्याय संगत नहीं कहा जा सकता है।यह कुछ कामचोर नेताओं एवं राजनैतिक दलों के लिए संजीवनी से कम नहीं है। जो अपनी कुर्सी बचाने के स्वार्थ से आम लोगों को आपस में भिड़ाने के लिए इस तरह के हथकंडे अपनाया करते हैं।इसका अत्यंत व्याख्यायित स्वरूप मैं किताब रूप में प्रकाशित कर रहा हूँ ।
    

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