Wednesday, 17 October 2012

Eise Imanadar P. M. se Darta Desh ?

                     प्रधानमंत्री में धृतराष्ट्रता

    इस समय केंद्र सरकार की बदनामी का धुवाँ बहुत उठा है इसका सीधा सा अर्थ है भ्रष्टाचार का लावा कहीं धधक जरूर रहा है। जिसे प्रधानमंत्री जी अपनी ईमानदारी की शीतलता से ठंडा नहीं रख सके। जेल में पडे़ अधजले लुकाठों की तपिश  आज भी केंद्र सरकार को झुलसा रही है।

     सत्ता में सम्मिलित लोगों ने राज धर्म का निर्वाह नहीं किया।जिस कारण कुछ लोग तो जेल गए कुछ जाने की तैयारी में हैं कुछ अधिक प्रभावशाली लोग हैं

  उन पर केवल अँगुलियाँ ही उठ रही हैं। न्याय शास्त्र का सिद्धान्त है यत्र यत्र धूमस्तत्र तत्र वह्निः अर्थात जहाँ जहाँ धुवाँ है वहाँ वहाँ आग जरूर होगी।

    सम्माननीय प्रधानमंत्री जी की ईमानदारी पर किसी को संदेह नहीं होना चाहिए हमारे जैसे छोटे लोग भी उनके सहज जीवन से प्रेरणा लेते हैं। उनके गौरव पूर्ण व्यक्तिगत जीवन एवं षिक्षा के प्रति मैं प्रणत हूँ।  प्रधानमंत्री जी की व्यक्तिगत ईमानदार छवि की हर कोई प्रशंसा करता है और होनी भी चाहिए, किंतु सार्वजनिक पदों पर बैठे लोगों का सार्वजनिक आचरण भी व्यक्तिगत ही माना जाता है। प्रधानमंत्री जी जिस सरकार के मुखिया हैं उसी के कई मंत्री उन्हीं के सरकारी तंत्र ने भ्रष्टाचार के आरोप में पकडे़ हैं। इसमें संदेह नहीं कि वर्तमान सरकार में रहते हुए कुछ मंत्रियों पर भ्रष्टाचार  के आरोप  लगे और कुछ जेल में भी हैं। हमारे प्रधानमंत्री  जी तब भी तो ईमानदार ही थे आखिर ऐसे मंत्रियों पर अंकुश लगाना भी तो उन्हीं का काम था जिसमें  वे असफल रहे। जिसका परिणाम आर्थिक घोटालों के रूप में भुगतना पड़ा देश को। यदि प्रधानमंत्री जी की ईमानदार छवि का भ्रम न रहा होता तो शायद और पहले शोर मचता और अपराधी मंत्रियों पर और शीघ्र कार्यवाही की जा सकती थी। ऐसे घोटाले  टाले जा सकते थे। आज बेशक मंत्री पकड़े गए हों  किंतु राष्ट्र की साख गिरी है। जनता का भरोसा टूटा है उसकी भरपाई कैसे होगी?

    जहॉं तक प्रधानमंत्री जी की ईमानदार छवि की बात है क्या लाभ हुआ इससे देश  को ? प्रधानमंत्री जी की ईमानदार छवि या योग्यता से हुआ लाभ महॅंगाई  घोटालों या सभी प्रकार के भ्रष्टाचार को ही मानकर संतोष  कर लेना चाहिए क्या ? यदि  प्रधानमंत्री जी के दल का कोई सदस्य इसमें सम्मिलित न भी हो तो भी इसे रोकने का दायित्व प्रधानमंत्री के नाते भी उन्हीं का था। 

     यदि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से अन्ना जी के संबंधों के आरोप लगे यदि संबंध हों भी तो भी किसी के प्रभाव में होने के आरोप को उन्होंने स्वयं नकारा है और यदि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ अन्ना जी के प्रभाव में हो तो बुरा भी क्या है वैसे भी अच्छी सलाह तो किसी की भी हो मानने में टालमटोल करना या बदले  की  भावना से टीम अन्ना को भी भ्रष्टाचार में घसीटना कहॉं तक उचित है ,ये कुटिलता  नहीं तो क्या है? हॉं,यदि टीम अन्ना, रामदेव,या किसी अन्य के विरूद्ध भी कोई शिकायत मिलती है तो उसकी जॉंच करना भी सरकार का ही कर्तव्य है।यदि कहीं कोई गड़बड़ी थी तो जॉंच क्यों नहीं हुई?

  एक बार धर्म सम्राट स्वामी करपात्री जी महाराज के शिष्य श्री सदानंद वेदांती जी से मैंने धृतराष्ट्र की ईमानदारी के विषय में यही प्रश्न किया था तो स्वामी जी ने अपने उत्तर में कहा कि जिस राजा के मंत्रिमंडल में कौरवों के जैसे भष्ट्र लोग सम्मिलित हों उस राजा का बेईमान होने की अपेक्षा ईमानदार होना ज्यादा खतरनाक होता है। क्योंकि ऐसा ईमानदार राजा बड़े-बड़े अपराधियों की ढाल बना रहता है भ्रष्टाचारियों को इतनी सुरक्षा और कहॉं मिल सकती है ?

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