Tuesday, 30 October 2012

Railway Ka Rona Dhona





                       रेल में खेल की तैयारी

  
    

    जिस घर का मालिक अवारा या लापरवाह होगा वहॉं घाटे के अलावा और कोई कल्पना करनी भी नहीं   चाहिए।ऐसे लोगों का न तो कोई व्यापार चलता है और न ही घर में आया हुआ पैसा ही टिकता है।बरक्कत कैसे हो?

    इस विषय में सरकार से  निराश  मैं समाज को याद दिलाना चाहता हूँ कि रेलवे की रिजर्वेशन कोच की प्रायः यह स्थिति ही होती है कि जिस सरकार के रेलवे मंत्रालय के विभाग का टी. टी. उन यात्रियों को एडजेस्ट करके बैठने की सलाह दे रहा होता है जिन्होंने कई कई महीनें पहले रिजर्वेशन केवल इस लालच में कराए होते हैं कि हम पत्नी एवं छोटे छोटे बच्चे लेकर जाएँगे जिससे दिक्कत न हो किंतु ट्रेन  के रिजर्वेशन कोच में घुसने में इतनी मारा मारी हो रही होती है कि सामान लेकर अंदर पहुँच पाना अत्यंत कठिन होता है।
     वहॉं तैनात सुरक्षा कर्मियों से लेकर टी. टी.तक कोई नहीं सुनता है शिकायत वो रिजर्वेशन के किराए से आधा किराया लेकर धडा़धड़ बैठा रहे होते हैं यात्री। डग्गामार टैंपू वालों से खराब स्थिति है रिजर्वेशन कोच के टीटियों की |
     ट्रेन  के अंदर बाथरूम तक में भरे गए होते हैं यात्री।रिजर्वेशन कोच में इसी सुविधा की बात कर रही है सरकार ? लघु शंका तक जाने के लिए परेशान रहते हैं लोग ।फर्श से लेकर सब कुछ बेच दिया होता है टी. टी. ने।है कोई देखने सुनने वाला उन यात्रियों की बात जिनसे सरकार पहले पैसे ले चुकी होती है सरकार ? जिसे उन लोगों से परेशानी हो वो स्वयं लड़े तो लड़े टी. टी. तो उसको एडजेस्ट करने की सलाह ही दे रहा होता है। पैसे  वसूलने में पुलिस वाले केवल  टी.टी. की मदद कर रहे होते हैं।रेलवे में अपराधों के बढ़ने का एक प्रमुख कारण पुलिस वालों की इस प्रकार के कामों में व्यस्तता भी है। क्या खिलवाड़ बना है रेलवे विभाग ? एक दिन अपने परिवार के साथ  मैं कानपुर से दिल्ली आ रहा था। हमारी सीट भी टी.टी. ने बेच रखी थी मुझे बहुत विवाद करने के बाद सीट नहीं मिली ।अचानक मुझे याद आया तो जब हमने अपना प्रेस कार्ड दिखाया तब अलीगढ़ में हमारी सीट  हमें मिली।कितना बुरा लग रहा था जब अपनी सीट के पास खड़े होकर परिवार सहित हमें आना पड़ा था?  हमारे जैसे जिन लोगों ने सरकारी रिजर्वेशन काउंटर से टिकट बुक कराई थी उनकी हालत ऐसी ही होती है ,जबकि सौ दो सौ रूपए टी. टी. को तत्काल देने पर टी. टी. न केवल तुरंत सीट दे देता है अपितु गंतव्य तक सारी जिम्मेदारी भी निभाता है। कई बार तो एक तिहाई यात्री रिजर्वेशन वाले और दो तिहाई टी. टी.वाले होते हैं त्योहारों के समय  यह संख्या और अधिक बढ़ जाती है।ऐसे में सरकार किराया बढ़ाकर घाटे की भरपाई भले कर ले किंतु उसकी सरकार चलाने की कार्यप्रणाली पर प्रश्न  उठने स्वाभाविक हैं।

सरकार जब अपने टी. टी. नहीं सुधार पाई  तो अन्य सुख सुविधाओं की आशा ही  कैसे की जाए?

    सरकार से अब इतनी उमीद भी कैसे की जाए कि इसके बाद ही ट्रेन के ठेकेदार एवं सुरक्षा कर्मी रिजर्वेशन वाले यात्रियों का शोषण नहीं करेंगे।            

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