Friday, 19 October 2012

सरकार बनाने का भी ठेका उठता है क्या ?

            सरकार बनवाने का ठेका जनता को ठेंगा 

    भारतवर्ष  में सफल लोकतंत्र है क्योंकि इसमें सरकार का गठन जनमत के द्वारा होता है जिस देश  में राजा लोग शासन करते हैं वहॉं राजतंत्र माना जाता है। इस प्रकार से दो ही विधाएँ प्रायः देखी सुनी जाती हैं। एक तीसरी विधा भी आजकल देखने को मिलती है।   

   इसमें राजनैतिक पार्टियाँ कम्पनी की तरह काम करती हैं जनहित के मुद्दे स्लोगन भाषण सब दर्द भरी आवाज में बोलने होते हैं।इस कला से जो भी सीटें जीत जाते हैं उनके आधार पर सरकार बनाने का ठेका उठ जाता है।ऐसे कम्पनी मालिक केवल चुनावों के समय ही बड़े रौब से रटा रटाया या लिखा लिखाया भाषण पढ़ कर चले जाते हैं। इस प्रकार राजनीति का बिजिनेस करते करते कम्पनी मालिक कई कई पीढ़ियाँ बिता देते हैं।ये आम आदमी से हमेशा  दूरी बनाकर रहते हैं ।यह लोकतंत्र राजतंत्र या ठेकातंत्र  है इसे क्या कहते हैं ?जैसे:- 

     कुछ देशों  में कुछ लोग या परिवार अपनी बेचारगी या लाचारी या गुणवत्ता दिखाकर पहले जनता के मन में दया करूणा लोभ आदि उत्पन्न करते हैं इसके बाद समाज को द्रवीभूत करके फिर उनसे वोट मॉंगते हैं। दया भावना वश जनता उनकी दयनीयता से प्रभावित होकर उनकी बात मानकर उनके कंडीडेट को विजयी बना देती है। ऐसे चालाक लोग स्वयं मंत्री प्रधानमंत्री आदि न बनकर किसी और की सरकार बनवाकर उस सरकार को ठेके पर उठा देते हैं और उस बेचारे ठेके के प्रधानमंत्री से न केवल पैसा वसूलते हैं अपितु उसे बात बात में मुर्गा बनाते रहते हैं। यह सब जलालत वह ईमानदार मजबूर  प्रधानमंत्री केवल इसलिए सहता है क्योंकि उस बेचारे की अपनी औकाद यह भी नहीं होती है कि वो ग्रामप्रधानी का चुनाव भी अपने बलपर लड़कर जीत सके। माल तो खाते हैं वे शातिर लोग और जनता की गाली सुनने के लिए बेचारा प्रधानमंत्री होता है।मंत्री लोग भी उसकी बात  सुनते ही नहीं हैं मानेंगे क्या ? कम्पनी मालिक लोगों के लिए पूरा देश अपने आँगन की तरह होता है जहाँ जो जगह चाहें खरीदें बेंचे ये  स्वतंत्र होते हैं।

     ऐसी सरकारों की प्रमुख विशेषता यह होती है कि इनका गठन लोकतंत्र के बिपरीत ढंग से किया जाता है।  जिसमें जिस विषय की योग्यता होती है लोकतंत्र में उसे वो पद दिया जाता है किंतु उपर्युक्त प्रकार से ठेके की सरकार गठित करने वाले राजनैतिक माफिया लोगों की अपनी एक अलग प्रणाली होती है। चूँकि सरकार ठेके पर उठाकर उन्हें लगाम अपने हाथ में रखनी होती है इसलिए वो अयोग्य लोगों को योग्य पद देते हैं। जिसने अपने घर की मलकियत कभी न सॅंभाली हो उसे देश का पधानमंत्री बना देते हैं जिसने राष्ट्र के विषय में सोचा ही न हो उसे राष्ट्र  का राष्ट्रपति बना देते हैं। जिसको कभी किसी ने बोलते न सुना हो उसे लोकसभा का स्पीकर बना देते हैं। सप्ताह महीना वर्ष  या पॉंच वर्ष में कौन कितना धन देगा यह पहले ही तय कर लिया जाता है। इस प्रकार पूरी सरकार का ठेका पहले ही उठ जाता है। ऐसे राजनैतिक माफिया अपनी जुकाम तक की दवा विदेशों  में ही लेने जाते हैं ये सारा खर्च  निकालने के लिए जनता को दी जाने वाली सुविधाओं में कटौती कर  दी जाती है टैक्स बढ़ा दिए जाते हैं । इस प्रकार जनता की गाढ़ी कमाई का पैसा विदेशों  में उड़ाया या जमा किया जा रहा होता है। ऐसो आराम में थोड़ी भी कमी होने पर आदमी के पेट पर लात मार देते हैं और उनके  हिस्से के गैस सिलेंडर काट लिए जाते हैं । डीजल पेट्रोल महॅंगा कर दिया जाता है इससे भी बात न बनी तो कोयला खदाने औने पौने दामों में बेच दी जाती हैं इसके अलावा भी सरकारों के पास जनता का धन लूटने के  बहुत सारे धंधे होते हैं। इतना सब हो जाने पर भी राजनैतिक माफिया लोग समाज से तो चुनावों के समय ही मिल पाते हैं जनता को दिखाने के लिए कभी कदा सरकारों को पत्र लिख दिया करते हैं किंतु सरकारों में बैठे लोग इतने भी मूर्ख नहीं होते हैं आखिर उन्हें भी तो कमाई करनी होती है। इसप्रकार ब्याकुल जनता के पेट में लात लगते ही जनता चिल्लाने लगती है किंतु कौन सुनता है उसकी आवाज?

   समाज की ऐसी ही ब्याकुलता पर अपनी राजनैतिक रोटियॉं सेंकता है विपक्ष । इसप्रकार मिलजुल कर मनाया जाता है भारतबंद का महामहोत्सव। राजनैतिक बिपक्षी पार्टियों के लोग एक दूसरे के गले मिलकर बधाईयॉं देते मिठाई बॉंटते और बड़े ही धूमधाम से यह उत्सव मनाते हैं। इसप्रकार सभी पार्टियों के लोग चल पड़ते हैं चुनावी महाभारत के महान पथ की ओर और चुनावी रणभेरियॉ बजने लगती हैं।
    राजतंत्र तथा लोकतंत्र के अलावा राजनैतिक माफिया लोगों के द्वारा बनवाई जा रही सरकारों को कौन सा तंत्र कहा जाए ? या कि इसे तंत्र मंत्र कहना ही बेहतर होगा या तो फिर इसे राजनैतिक अंधविश्वास कहा जाए तो ऐसे अंधविश्वास के विरूद्ध कार्यवाही होनी चाहिए किंतु करेगा कौन ?


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