Tuesday, 6 November 2012

ज्योतिष और धर्म बना अपनों को ठगने का बहाना ?

  अपनों को ठगने का बहाना बना ज्योतिष और धर्म ?



      आज समाज अनेकों प्रकार की पीड़ा से परेशान है, शासक और शासित वर्ग में भारी आपसी अविश्वास हो गया है।यह अविश्वास की ज्वाला राष्ट्र से लेकर परिवार तक की अवधारणा समाप्त करती जा रही है। परिवार बिखर रहे हैं; समाज टूट रहा है; पति-पत्नी, पिता-पुत्र, भाई-भाई आदि अत्यन्त महत्त्वपूर्ण सम्बन्ध भी स्वार्थ पोषित हो रहे हैं; किसी को किसी से भी मिलकर शान्ति नहीं मिल रही है। आने-जाने के साधन बहुत हैं किन्तु जाएँ तो जाएँ कहाँ? मोबाइल हैं किन्तु बात किससे करें? हाल-चाल लोग दिनभर पूछते हैं किन्तु किसी को किसी के सुख-दुख से क्या लेना देना? शिक्षा-दीक्षा (आध्यात्मिक शिक्षा) चिकित्सा आदि जो कार्य पहले सेवा के लिए जाने जाते थे वे ही आज व्यवसाय बन चुके हैं।

    सत्संग की भावना समाप्त हो रही है। सत्संग के नाम पर हो रही भारी रैलियाँ आर्थिक प्रदर्शन मात्र बन कर रह गई हैं; वैराग्य का मेरूदंड श्रीमद् भागवत जैसा आत्म रंजन का महान श्रोत आज मनोरंजन के लिए संगीत में सुनाया जा रहा है जिसमें उसका उद्देश्य ही  नष्ट हो रहा है। साक्ष्य के नाम पर गीता की गरिमा घटाई जा रही है। योग के नाम पर योगासन, भागवत कथा के नाम पर मनोरंजन, आत्मज्ञान के नाम पर मनगढ़ंत कपोल कल्पित बातें आदि। जो साधु-संत, कथा वाचक आदि टेलीवीजन देखने को पहले रोका करते थे आज टी.वी. से वे स्वयं झाँक रहे हैं। मन्त्र-दीक्षा के नाम पर व्यवसाय हो रहा है।शिष्य  की जगह सदस्य बनाने की होड़ लगी है। यज्ञादि महान कार्य अब एक उत्सव की तरह होने लगे हैं। सनातन धर्म में लाखों ग्रन्थ हैं किन्तु ब्राह्मण समाज चार किताबों के बल पर जीवन व्यतीत कर ले रहा है वो है विवाह पद्धति, सत्य नारायण व्रत कथा, गरुड़ पुराण और पंचांग। बाकी ग्रन्थ कौन पढ़ेगा? कौन समझाएगा, शास्त्र-संचित ज्ञान? कैसे लाभान्वित होगा सनातन समाज? बिना पढ़े ही ऐसे लोग धर्म शास्त्रों से सम्बन्धित किसी भी प्रश्न का मनगढ़न्त उत्तर बेझिझक देते हैं। ऐसे में क्या होगा  निर्णयसिन्धु, धर्म-सिन्धु जैसे महान् संग्रह ग्रन्थों का? कुछ लोग तो बिना कुछ जाने समझे ही बिना वैराग्य के ही वैरागी हैं मानों परिवार से सकुशल भाग आए इसी खुशी में दाढ़ा झोटा बढ़ाया कपड़े रंग कर ब्रह्मज्ञानी, आत्मज्ञानी, सांसद, मंत्री, अध्यक्ष उपाध्यक्ष  आदि बनने लगे हैं ‘क्या हुआ है समाज को? ब्राह्मण संध्या, अग्निहोत्र, वेदाध्ययन आदि से विरत हो रहे हैं। महर्षि मनु की महान सूक्तियाँ आज निंदित हो रही हैं। उनका अभिप्राय समझाने वालों का अभाव होता जा रहा है जिसका दुष्प्रभाव समाज पर इस प्रकार पड़ा है कि मनुस्मृति नामक महान ग्रन्थ जो समाज रक्षण के लिए बना था उस पर भी आज समाज भक्षण की भावना के आरोप लग रहे हैं।

      ऐसी विषम परिस्थितियों  में धर्म का ही एकमात्र सहारा बचता है वो भी आज दूषित किया जा रहा है अब समाज किसकी ओर देखे ?

     ऐसे विषम  समय में  भी  राजेश्वरी प्राच्य विद्या शोध संस्थान  व्यवसायिक भावना से ऊपर उठकर समाज के साथ खड़े होने को तैयार है जिसका विस्तार एवं प्रचार प्रसार तथा सफल संचालन के लिए आपके भी सभीप्रकार से  सक्रिय सहयोग की आवश्यकता है। इसमें सभी प्रकार की पारदर्शिता बरती जाएगी साथ ही आपके सहयोग एवं सुझाव  आदि सादर आमंत्रित हैं ।


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