Friday, 21 December 2012

मोदी को बन्दर बताने वाले स्वयं बन्दर बन गए

किसे कौन क्या कह देगा ?

 

     राजनीति का भी अजब हाल है।लोग किसी को कुछ भी बोल देते हैं ।इसके बाद कह देते हैं कि मैंने तो ऐसा कहा ही नहीं या मेरे कहने का ये उद्देश्य  नहीं था या मेरी बात मीडिया ने तोड़ मरोड़ कर छापी है। आदि आदि....।
      भाषा का एक नियम होता है कि आपकी कोई भी बात जितने प्रतिशत या जैसी भी सामने वाले को समझ में आती है वो उसका साधारणीकरण होता है जो नहीं समझ में आती है वो व्यक्तिवैचित्र्यवाद होता है। जिसकी बात में व्यक्तिवैचित्र्यवाद जितना अधिक होता है।उतना उसको असफल वक्ता माना जाता है।
    वक्तुः तद् असामर्थ्यम श्रोता यत्र न बुध्यते।  

    वक्ता कुछ और समझाना चाह रहा है किंतु श्रोता कुछ और समझ रहा है इसका मतलब वक्ता में समझाने की ताकत नहीं है।वो निरर्थक ही बोला करता है निरर्थक बोलने का दुर्गुण अक्सर  पागलों में पाया जाता  है किंतु नेताओं की बातों में पता नहीं क्यों अक्सर आजकल ऐसा होते देखा जा रहा  है, जो चिंता की बात है।जब किसी नेता की ऐसी कोई भ्रामक खबर चैनलों पर खूब दिखाई जा चुकी होती है  तो दूसरे दिन वे संबंधित व्यक्ति की प्रशंसा या आदर सम्मान की बात कर रहे होते हैं।इस प्रकार का आचरण प्रेरणा योग्य नहीं माना जा सकता।इस बिषय  में एक कहानी मैंने पहले कभी किसी से सुनी थी--
     एक बंदर का आतंक पूरे शहर में फैला हुआ था  बंदर से सब परेशान थे।उस बंदर को घेरने के लिए कुत्ते छोड़े गए किंतु ये केवल भौंकने वाले थे ये पता नहीं क्यों काटने से डरते थे या काट नहीं पाते थे या काटना उनको आता ही नहीं था लोगों को शक होने लगा कि इनकी मिली भगत तो नहीं है?कहीं ऐसा तो नहीं है कि बंदर ने इन्हें रोटी का टुकड़ा दिखाकर पटा रखा हो क्योंकि तेजी से भौंकने वाले कुत्ते अचानक भौंकना बंद क्यों कर देते हैं।लोंगों ने नजर रखनी शुरू की तो देखा कि जब कुत्ते तेजी से भौंकने लगते हैं तो बंदर घरों से लूटकर लाई हुई रोटी का टुकड़ा उनकी ओर भी फेंक देता था वो भी खाने में मस्त हो जाया करते थे।
      बंदर तो रोटी किसी के घर घुस कर उठा लाते हैं क्योंकि वे सभी घरों को अपना समझते हैं।कहीं भी उनका सहज प्रवेश संभव भी होता है उन्हें कोई सहसा पकड़ भी नहीं पाता है।जहॉं तक बात गलियों  में घूमने वाले कुत्तों की है पहली बात तो उनका घरों में सहज प्रवेश  संभव ही नहीं होता है यदि कदाचित घुस भी जाएँ  तो घर वाले बड़ी बुरी तरह मारते हैं।पिटने के बाद वे असहाय घबराए कुत्ते भौंकते हुए भागते हैं। मानों वो कह रहे हों कि हम नहीं बंदर था... बंदर!आदि आदि....।खैर यह तो कहानी है।

     आजकल  राजनीति में प्रायः इसी प्रकार के उदाहरण अक्सर मिलते रहते हैं। अब तो समाज सुधारकों ने भी ऐसे आरोप आरोप लगाने शुरू कर दिए हैं कि सभी राजनैतिक दलों में आपसी मिली भगत है। इस प्रकार से कई बार शिकायत का प्रचार करने वाले विरोधियों की बातें सुनकर ये समझ में ही नहीं आता है कि ये विरोध कर रहे हैं या प्रचार ? 
     देश  की सबसे पुरानी पार्टी एक बंदर के आतंक से परेशान है उसके कार्यकर्ता जिसे बंदर बताते हैं वह तो मदारी अर्थात बंदरों को नचाने वाला माहिर मदारी माना जाता है और जिसे वो शेर बताते हैं उसे दहाड़ते कभी किसी ने सुना हो तो सुना हो हमनें तो चीं चीं करते भी नहीं सुना है।वो जिस माँद में रहता रहै वो उसकी  अपनी तो है ही नहीं किराए की भी नहीं हैं वह तो किसी की कृपा की है। किसी और की कृपा पर दिन गुजारने वाला तो सरकस का ही  शेर  हो सकता है, जिसे सरकस वाले अपने इशारों पर नचाते हैं किसी और के इशारे पर नाचने वाले सिंह तो केवल नाम के ही सिंह होते हैं इनका तो जीवन ही अपने वंश के गौरव को गिराकर ही सम्मान पाने के लिए होता है।इन्हें किस किस के ताने बातें कितनी कितनी बेचारगी से सुननी सहनी होती हैं।ये तो ऐसे शेरों की आत्मा ही जानती है।
     वैसे भी लगभग सभी प्रकार के राजनैतिक या निजी संगठन सभी अपनी अपनी पार्टी या दल को निजी कंपनी की तरह चलाते हैं उसका लगभग हर पद ठेके पर उठता है हर पदाधिकारी या अधिकारी के चेहरे पर दाम लिखे गए होते हैं कि कौन कितने में बिकेगा।हर कुर्सी उपजाऊ  खेती की तरह होती है इस खेती की नीलामी होती है इसकी तो बोली लगती है जिसकी जैसी कीमत उसकी वैसी कुर्सी और जैसी जिसकी कुर्सी अर्थात खेती वैसी उसकी फसल।यह बात कहने का हमारा प्रमुख उद्देश्य यह है कि जो किसान होता है वह बैल या भैंसा जो कुछ भी जोतने के लिए रखता है उसे पहले  बधिया अर्थात नपुंसक करता है बाद में जोतता है।उसे पता होता है कि यदि इसे नपुंसक नहीं करेंगे तो ये हमारा अनुशासन नहीं मानेगा। जो नपुंसक हो ही गया हो वो मन से तो खेत भी नहीं जोतता ,वह तो भुगत रहा होता है, मरता क्या न करता?यही  हालत राजनैतिक शेरों  की होती है। 
     शायद यही कारण है कि पढ़े लिखे  प्रतिभा संम्पन्न स्वाभिमानी लोग प्रायः राजनीति में नहीं जाना चाहते हैं।किसी प्रकार यदि कुछ लोग घुस पाए हैं और उनको स्वतंत्र काम करने का मौका दिया जाता है तो ऐसे लोगों ने ही देश  की गरिमा बचा रखी है।जो मार्ग अत्यंत कठिन है।इसीलिए सुशिक्षित नौजवान राजनीति में जाने की हिम्मत ही नहीं जुटा पाते हैं। अन्यथा सत्ता और पद प्रतिष्ठा का आकर्षण किसे सम्मोहित नहीं करता?जो राजनीति में सहज सुलभ होता है।सौभाग्यवश देश के पढ़े लिखे चरित्रवान प्रतिभा संम्पन्न स्वाभिमानी लोग जो संयोगवश  राजनीति में पहुँच गए हैं वे या तो दबे कुचले कहीं पड़े पड़े दिन काटा करते हैं या तो मीडिया की रोजी रोटी के लिए कुछ बोला बदला करते हैं इनकी ड्यूटी ऐसी ही जगह लगाई जाती है। कई तो हिंदी में गाली देकर इंग्लिस में माँफी माँगने के लिए रख लिए जाते हैं पड़े रहते हैं,कहीं माँफी मँगाने के काम आते हैं,किसी बाबा जोगी को पटाने फुसलाने के काम आ जाते हैं ,और भी आड़े तिरछे वक्त में कहीं काम आ जाते हैं। बदले में तथाकथित कंपनी मालिक खुश होकर नेग न्योछावर के रूप में कोई मंत्री मुंत्री पद देकर कृतार्थ कर देते हैं।राजनीति में अक्सर लोगों की इसीलिए जबान फिसलती है दरसल यह मंत्री मुंत्री पद पाने के लिए तीर तुक्का लगाया गया होता है,तीर चूक गया तो मॉफी मॉंग ली और यदि निशाने पर लग ही गया तो बल्ले बल्ले। 

 

राजेश्वरी प्राच्यविद्या शोध  संस्थान की अपील 

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