Wednesday, 12 December 2012

आखिर महिलाओं की सुरक्षा कैसे करे सरकार ?

              हँसना हँसाना इतना ज़रूरी है क्या ?

      साहित्य शास्त्रों में कला की सीमा वहीं तक मानी गई है जहॉं तक बड़ी बडी़ बातें गीतों और इशारों में ही होती हैं।जब खुला नंगपन शुरू हो जाए तो उसे कला कैसे कहा जा सकता है?आज कॉमेडी के नाम पर जो कुछ भी हो रहा है वो फूहड़पन के अलावा कुछ और दिखाई सुनाई ही नहीं देता है। अपनी बीबी बेटी मॉं बाप भाई बहन का नाम किसी और के साथ बेशक मजाक में जोड़ दिया जाता है किंतु इससे क्या सिखाने का प्रयास किया जा रहा है?

      इसीप्रकार टी.वी. पर आने वाले कई कार्यक्रमों में लड़कियों को बहुत छिछले ढंग से प्रस्तुत किया जा रहा होता है।वो भी हॅंसते हॅंसते वो रोल पैसे के कारण निभा रही होती हैं।सोहागरात जैसे शब्द तो आम होते जा रहे हैं।एक लड़का कामेडी के नाम पर दूसरी आधे अधूरे कपड़ों वाली लड़की की चिकनी टॉंगों की बात बता रहा होता है।सोहागरात और सोहागरात पर दूध का गिलास की चर्चा तो धीरे धीरे अधिकांश  कार्यक्रमों में दिखती है।कमेडी के नाम पर मिसे जा रहे होते हैं एक दूसरे के शरीर, बोले जा रहे होते है एक दूसरे के माता पिता के विषय में अश्लील वाक्य!मांसल मंथन इतना अधिक बोला जा रहा होता है कि उसमें कला तो कहीं दिखाई सुनाई ही नहीं पड़ती है।सारी भाषा  ही एक दूसरे को गाली गलौच देने की होती है। अरे! यह कैसी कामेडी?यदि एक दूसरे को बेइज्जत करके ही हॅंसाना जरूरी है तो यह तो आम चौराहों पर भी होता है।
           इसी तरह किसी भी प्रकार के किसी भी चीज के विज्ञापनों में, कोई प्रोडक्ट बेचने के लिए महिलाओं के शरीरों को भड़कीला बनाकर अर्द्धवस्त्रों में उन शरीरों को दर्शनार्थ परोसा जा रहा होता है। जिसका शरीर ऐसे शरीर धारण करने वाली सुंदरियॉं पूरे होश  हवाश  में तय शुदा पेमेंट लेती है। लोग देखकर पागल होते हैं और पैसा खर्च करते हैं कुछ पोडक्ट खरीदने में कुछ उसे देखने छूने में पाने के लिए प्रयत्नशील हो जाते हैं कोई इसप्रकार का अपना पागलपन किसी और पर निकालता है जो जब जहॉं शिकार बनता है वो सरकार को दोषी ठहराता है क्या करे सरकार क्या करे कानून व्यवस्था ? आखिर ये तो उसे भी पता है कि हम शरीर की नुमाईश  बनाने जा रहे हैं फिर क्या करे सरकार ?कितनी कितनी किसको किसको कहॉं कहॉं क्या क्या कैसे कैसे सुरक्षा मुहैया करावे सरकार!         

       आज पार्कों मैटो  स्टेशनों आदि सार्वजनिक जगहों पर जितनी बेसबरी से लड़के लड़कियॉं अपने तथाकथित प्रेमी प्रेमिका का इंतजार करते देखे जा सकते हैं। विशेष बात यह है कि लड़कों की अपेक्षा लड़कियों में भी मिलने की बेसबरी उन लड़कों से कहीं कम नहीं होती जो अपने तथाकथित प्रेमियों का इंतजार कर रही होती हैं।ऐसे तथाकथित प्रेमी प्रेमिका जब तक पटरी खाती है तब तक दोनों एक दूसरे को चिपटने चाटने में पूरी रह समर्पित होते हैं सच्चाई ये है कि विवाहित लोग इतने स्नेह से कम ही रहते देखे जाते होंगे जितने विवाहेतर  संबंधी या अविवाहित लोग।दोनों का दोनों के प्रति पूर्ण समर्पण होता है।जिन्हें देखकर कभी नहीं लगता कि इन्हें कोई जबरर्दस्ती घसीट या बॉंध कर लाया है।दोनों दोनों की गोद में लेट कर इतना खुश  होते हैं जितना शायद मॉं की गोद में भी नहीं हुए होंगे।वे एक नहीं सात नहीं सात सौ जन्म भी एक साथ रहने का वायदा करते देखे जा सकते हैं।दूसरे ही क्षण कोई दूसरा अच्छा सौदा पटते ही दोनों एक दूसरे के दुश्मन बन जाते हैं वो दुश्मनी कहॉ  तक कितनी बढ़ेगी कौन कह सकता है?दोंनों एक दूसरे को मिटा देने के लिए हर संभव कोशिश  करते देखे सुने जा सकते हैं और वो करते भी हैं कोई किसी को बरबाद करने में कसर नहीं छोड़ता है।कोई किसी पर तेजाब फेंकता है, कोई किसी और तरह मारता है कोई मारने के बाद भी छोटे छोटे टुकड़े कर रहा होता है कितनी घृणा भरी होती है उनमें एक दूसरे के प्रति?कल्पना नहीं की जा सकती है।?

     इसी प्रकार और जितने भी बासनात्मक व्यवसाय बनाए गए हैं वहॉं भी लड़के लड़कियॉं जो भी हों सब बॉंधकर ही नहीं लाए गए होते हैं।सब में मिलाजुला कुछ ऐसा ही होता है लड़कियॉ स्वयं रुचि लेती दिखती हैं।

      त्याग बलिदान की प्रेरणा देने वाले शिक्षण संस्थानों में आज अध्यापक अध्यापिकाएँ  इतना भड़कीला श्रंगार करते हैं।क्या बच्चे उनसे संयम की प्रेरणा लेंगे?लगभग हर संस्था रिसेप्सन पर कोई  सुंदर युवा लड़की बैठाती है ताकि उसकी वेष भूषा से देखने वाले लोगों को पूरा दर्शन सुख मिले। आज  बाबाओं को भी आगे बढ़ने के लिए सुंदरियों की जरूरत पड़ती है जब तक ऐसी वैसी कुछ सुंदरी नायिकाएँ  योग सीखने नहीं आती हैं तब तक बाबाजी अच्छे योगी नहीं माने जाते हैं   जब तक सुंदर चेली साथ में न हो तब तक साधुता जमती नहीं है इसी प्रकार ज्योतिष  आदि को भी व्यवसाय की दृष्टि  से देखने वाले लोग भी केवल अपनी विद्या के बल पर समाज में नहीं उतरते हैं।उन्हें भी इस तरह के ग्लेमर की जरूरत पड़ती है।वो  भी विज्ञापनीय झूठ बोलने के लिए एक लड़की साथ लिए बिना आगे नहीं बढ़ते हैं। इन सारी बातों को कहने के पीछे हमारा उद्देश्य  मात्र इतना है कि प्राचीन भारतीय संस्कृति में महिलाओं को जो सम्मानपूर्ण स्थान प्राप्त था वह केवल उनके सद्गुणों के कारण ही था।इसका यह कतई मतलब नहीं था कि वो सुंदरी नहीं थीं या वो श्रंगार नहीं करती थीं। पुरुषों को हर युग में फिसलते देखा जा सकता है जबकि महिलाओं ने हर युग में धैर्य एवं संयम से काम लिया है और हमेंशा अपने गौरव की रक्षा की है।आज फिर से समय आ गया है जब कन्याओं में गुणों की गरिमा बढ़ाने पर जोर दिया जाए शरीरों की सुंदरता एक जैसी कभी नहीं रहती है जबकि गुणों का गौरव हमेंशा अमर रहता है पुरुषों को भी ऐसे कार्यक्रमों का न केवल विरोध अपितु बहिष्कार करना चाहिए,जो अपने पारंपरिक मूल्यों को मिटाने की ओर अग्रसर हों।  

 

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