Monday, January 7, 2013

युवाओं को सुधारने के लिए फाँसी ! आखिर अब संतों का क्या काम ?

       फाँसी की जगह सुसंस्कारों की आवश्यकता 

  आज समाज में महिलाओं के लिए बन रहे असुरक्षित वातावरण की जितनी भी निंदा की जाए कम होगी और ऐसे अपराधियों की पहचान करने की प्रक्रिया पारदर्शी एवं विश्वसनीय होनी चाहिए।उन लड़का लड़की या स्त्री पुरुषों में जिसका भी अपराध सिद्ध हो ऐसे अपराधियों को अपराध निरोधक कठोरतम दंड की व्यवस्था होनी ही  चाहिए।
  यहॉं केवल पुरुष या लड़के ही अपराधी होंगे ऐसी सोच ही क्यों रखना आखिर वे भी इसी समाज के अंग हैं?महिलाओं की तरह ही सभी पुरुष  भी अपराधी नहीं हो सकते जिस प्रकार हर महिला किसी न किसी पुरुष  की मॉं बहन बेटी होती है उसी प्रकार हर पुरुष  भी किसी न किसी महिला का पिता भाई पुत्र आदि होता है। महिलाओं की सुरक्षा के नाम पर ऐसे अपने पिता, भाई, पुत्र आदि को निरपराध दंडित होते देख कर कोई महिला या लड़की क्या अपने को सुरक्षित अनुभव कर सकेगी?दूसरी बात अपराधी केवल अपराधी होता है वह स्त्री पुरुष  हिंदू मुश्लिम,हरिजन सवर्ण आदि कुछ भी नहीं होता है।इसलिए किसी घटना के घटने पर उस क्षेत्र,जाति समुदाय सम्प्रदाय स्त्री पुरुष  आदि समूचे वर्ग को कोसने की शैली ठीक नहीं है।इससे मीडिया को शोर मचाने में सुविधा भले होती हो किंतु कुछ लाभ न होकर उसके नुकसान अवश्य उठाने पड़ते हैं।उस वर्ग के भले लोग जो उस तरह के अपराध को रोकने में अपनी अपनी शक्ति सामर्थ्य  के अनुशार सहयोग भी करना चाहते हैं उन्हें भी शर्मिंदगी के कारण दूरी बनाए रखनी पड़ती है।
    आज वातावरण ऐसा बनता जा रहा है कि पार्कों आदि सामूहिक जगहों में जिन जगहों पर जितना अधिक लुकने छिपने का बहाना होता है वहॉं उतनी बेशर्मी से युवा लड़के लड़कियों के शिथिल आचरण देखे जा सकते हैं। रेस्टोरेंटों, पार्कों ,पिच्चरहालों, मैट्रो  स्टेशनों आदि सामूहिक जगहों पर अक्सर युवा लड़के लड़कियों को लिपटते चिपटते चूमते चाटते देखा जा सकता है।दोनों प्रसन्न दिखते हैं दोनों बड़ी बड़ी बातें करते देखे सुने जा सकते हैं।यदि इन दो में से किसी एक के जीवन में कोई तीसरा नया आया तो तकरार शुरू होती है।वह कहीं तक भी जा सकती है।कई बार बड़े बड़े अपराध तक होते देखे जाते हैं।चूँकि ये सार्वजनिक जगहें होती हैं जहॉं बहुत सारे लोग देख रहे होते हैं ये बात अलग है कि वे देखने वाले ज्यादातर अपरिचित लोग होते हैं किंतु वो भी स्त्री पुरुष लड़के लड़कियॉं आदि ही होते हैं उनके भी मन उसी प्रकार की बासना के भाव से भावित होते हैं।जिसे उन्होंने संयमपूर्वक रोक रखा होता है। जिसमें जो अविवाहित युवा लड़का या लड़की है वो इनका काम कौतुक देखकर भी अपने मन पर कितना संयम रख पाएगा ये उसके अपने संयम के अभ्यास सदाचरण एवं माता पिता परिवार आदि के संस्कारों पर निर्भर करता है। इनमें भी जो अविवाहित युवा लड़का या लड़की अपने जीवन में एक बार किसी से बासनात्मक सुख ले चुके होते हैं ऐसे  लड़के  लड़कियाँ  सामूहिक स्थलों पर चल रही रास लीला देखकर वो अपने को नियंत्रित रख पाएँगे इसकी संभावना बहुत कम होती है अर्थात वो कुछ भी करने पर उतारू हो जाते हैं।

काम शास्त्र एवं साहित्य शास्त्र में वर्णन मिलता है      ज्ञातः स्वादुः विवृत जघना कः बिहातुं समर्थः?      अर्थात एक बार बासनात्मक सुख का स्वाद पता लग जाने पर फिर उस तरह की परिस्थिति देखकर भी कौन छोड़ पाने में समर्थ हो सकेगा ?

     इसी प्रकार आयुर्वेद में शरीर के तीन मुख्य उपस्तंभ बताए गए हैं भोजन, निद्रा और मैथुन। इनके कम और अधिक होते ही शरीर रोगी होने लगता है।इसलिए भोजन, नींद और बासनात्मक इच्छा रोक पाना अत्यंत कठिन होता है उसमें भी आज कल  विवाह बिलंब से होने लगे हैं।

     प्राचीन भारत में ऐसी ही परिथितियों से निपटने के लिए नियम, संयम, सदाचार, व्रत, उपवास, योगिक क्रियाएँ,प्राणायाम, वैराग्य बढ़ाने वाले साहित्य को पढ़ने की प्रेरणा दी जाती थी फिर भी वैराग्य या ब्रह्मचर्य में स्थित रह पाना अत्यंत कठिन होता था। विश्वामित्र पराशर आदि ऋषि  आखिर डिग ही गए,तो आज सब कुछ खाने, सब कुछ देखने एवं सब तरह का जीवन जीने वाले अविवाहित युवक युवतियों की  ब्रह्मचर्य जन्य संयम की परीक्षा ही क्यों लेनी?

    जहाँ तक कठोर कानून की बात है सरकारी स्तर से ऐसे प्रयास करने में बुराई नहीं है कुछ तो ऐसा करना ही पड़ेगा जिससे इसप्रकार के  स्वेच्छाचार पर नियंत्रण हो सके ।

   यहाँ एक बात और ध्यान देनी होगी कि अक्सर ऐसे मामलों में कदम रखने वाले युवक युवतियाँ  बासनात्मक पीड़ा से इतना अधिक परेशान होते हैं कि वो जिसे पाना चाहते हैं वो भाव नहीं देता है तो ये ऐसी कुंठा के शिकार हो जाते हैं कि अपनी जीवन लीला स्वयं ही समाप्त कर लेते हैं।कई बार ऐसे ही युवा लोग मैट्रो, माल,हॉस्पिटल,होटल, नदी,झील या अपने घरों के पंखों में ही लटक कर अपनी जीवन लीला समाप्त कर लेते हैं।ये बातें अक्सर देखने सुनने को मिलती हैं।आखिर फाँसी पर कितने को लटकाया जाएगा? जबकि ऐसे मामलों में आत्म हत्या  के मामले बहुत अधिक मिलेंगे।इसलिए यदि मृत्यु दंड से बात बननी होती तो बहुत पहले बन गई होती।एक धर्माचार्य होने के नाते  मेरा मन ऐसे लड़के लड़कियों की होने वाली दुर्दशा से  बहुत आहत है। आखिर क्या अपराध उनके माता पिता का है जिनके बच्चे मारे जा रहे हैं, या आत्महत्या  करके मर रहे हैं, या मृत्यु दंड देकर मारे जाएँगे। यदि इन तीनों प्रकार के बच्चों के माता पिता के आँसू बहना रोका जा पाना संभव हो पाता तो सर्वोत्तम होता! आखिर जो  दुखद हुआ है वैसा दुबारा न हो, या जो हो रहा है वो अच्छा हो, और  जो आगे होगा वह भी राष्ट्रहित में हो ।

      उचित होगा यदि सार्वजनिक जीवन में फिल्म, सीरियल,हास्यब्यंगकार्यक्रमों,विज्ञापनों आदि की भाषा शैली एवं दृश्यों के सुधार पर ध्यान देकर शालीनता के द्वारा युवाओं के संस्कार सुधारने पर ध्यान दिया जाए !

     आजकल कामेडी शो  से लेकर अन्य फिल्म, सीरियल आदि जगहों  के हास्य ब्यंग एवं तथाकथित कवि सम्मेलनों में केवल लड़की,और लड़की पट गई या लड़की नहीं पटी,या सुहागरात,या बेलेंटाइन डे यही तो चर्चाएँ  तो होती हैं टॉफी गोली की तरह लड़कियॉं एवं उनकी शिथिल चर्चाएँ परोसी जा रही होती हैं।हर प्रकार के विज्ञापनों का यही हाल है।हर ज्योतिषी  ने एक सुंदर सी लड़की झूठी तारीफ करने के लिए अपने साथ बैठाई होती है कि  शायद इस लड़की के बहाने ही कुछ लोग हमें देख लें।    शरीरों पर ही हास्य ब्यंग हो रहे हैं सुंदर युवा शरीर पहले अर्द्धनग्न वेष  भूषात्मक अवस्था में खड़े किए जाते हैं फिर उनकी भाषात्मक छीछालेदर की जाती है।जिसे सुनकर तथाकथित राजा महराजा रूपी दर्शक यह सोचकर खुश हो रहे होते हैं कि हमारी बेटी के बिषय में तो कहा नहीं जा रहा है,इसलिए हॅंसो और हॅंसो, खूब हॅंसो, हॅंसने में क्या जाता है अपना? जिस दिन अपने और पराए की यह कलुषित  भावना छूट जाएगी उस दिन महिलाओं पर हो रहे अत्याचारों से समाज को मुक्ति मिलेगी।

    इसलिए रसिक युवा लड़के लड़कियों को सार्वजनिक जगहों पर लिपटने चिपटने चूमने चाटने जैसी आदतों पर भी नियंत्रण करके अपनी सुरक्षा की कुछ जिम्मेदारी स्वयं भी सॅंभालनी चाहिए।सरकार और कानून तो अपना काम करेगा ही किंतु केवल इसी के सहारे भी रहना ठीक नहीं है।

      कई बार इंटरनेट,ब्लू फिल्मों, या जनरल फिल्मों के बासना बढ़ाने वाले दृश्य संवाद आदि देखने सुनने याद करने पर मन भड़क उठता है। ऐसे समय पति पत्नी या प्रेमी प्रेमिकाओं के हाथ चंचल हो उठते हैं और संयम का बॉंध टूट जाता है।दोनों में से कौन किसके कहॉं कैसे हाथ लगा रहा होता है कुछ देर के लिए यह विवेक दोनों को नहीं रह जाता है।कई बार फिल्म आदि देखकर निकले प्रेमी प्रेमिकाओं को रिक्सा या आटो पर भी शिथिल व्यवहार करते देखा जा सकता है।जिसका देखने वालों पर गलत असर पढ़ना स्वाभाविक है।उस क्रिया की प्रतिक्रिया कितनी बड़ी होगी कह पाना बड़ा कठिन है।उस प्रतिक्रिया के वेग को रोक पाना किसी के लिए बड़ा कठिन होता है फिर भी अपराध रोकने के लिए कठोर कानून तो बनें ही साथ साथ हमें भी अपने आचार व्यवहार में संयम से काम लेना चाहिए।
   राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख का यह बयान कि बलात्कार भारत में नहीं इंडिया में होते हैं।उनके कहने का अभिप्राय यह हो सकता है कि भारतीय संस्कारों में पली बढ़ी कोई युवा अविवाहित लड़की किसी अन्य लड़के के साथ फिल्म देखने जाएगी ही क्यों ?हो सकता है कि वहॉं न गई होती तो बचाव भी हो सकता था, किन्तु  यहॉं एक प्रश्न यह भी उठता है कि और कहीं भी गई होती, अपने दोस्त की जगह घर के किसी सदस्य के साथ ही गई होती तब भी तो यह सब कुछ होना संभव था,किंतु घर के सदस्य और दोस्त में अंतर होता है दोस्त एक सीमा तक साथ दे सकता है जबकि पति पिता पुत्र भाई आदि पारिवारिक संबंधों के समर्पण की बराबरी कोई और कैसे कर सकता है?फिर भी कौन किसका कैसा कितने दिन का कितना समर्पित दोस्त है यह उसे या उसके घर वालों को ही पता होगा। भारतीय संस्कारों की दृष्टि से तो यही कहा जा सकता है कि ऐसी लड़कियॉं तो अकेली और पूर्ण अकेली होती हैं उनका वहॉं कोई अपना नहीं होता है जहॉं अपराधी ऐसी घिनौनी वारदातों को अंजाम देते हैं।इसलिए उन्हें अपनों के साथ ही देर सबेर निकलने का प्रयास करना चाहिए ।

राजेश्वरी प्राच्यविद्या शोध  संस्थान की अपील 

   यदि किसी को केवल रामायण ही नहीं अपितु ज्योतिष वास्तु धर्मशास्त्र आदि समस्त भारतीय  प्राचीन विद्याओं सहित  शास्त्र के किसी भी  पक्ष पर संदेह या शंका हो या कोई जानकारी  लेना चाह रहे हों।शास्त्रीय विषय में यदि किसी प्रकार के सामाजिक भ्रम के शिकार हों तो हमारा संस्थान आपके प्रश्नों का स्वागत करता है ।

     यदि ऐसे किसी भी प्रश्न का आप शास्त्र प्रमाणित उत्तर जानना चाहते हों या हमारे विचारों से सहमत हों या धार्मिक जगत से अंध विश्वास हटाना चाहते हों या राजनैतिक जगत से धार्मिक अंध विश्वास हटाना चाहते हों तथा धार्मिक अपराधों से मुक्त भारत बनाने एवं स्वस्थ समाज बनाने के लिए  हमारे राजेश्वरीप्राच्यविद्याशोध संस्थान के कार्यक्रमों में सहभागी बनना चाहते हों तो हमारा संस्थान आपके सभी शास्त्रीय प्रश्नोंका स्वागत करता है एवं आपका  तन , मन, धन आदि सभी प्रकार से संस्थान के साथ जुड़ने का आह्वान करता है। 

       सामान्य रूप से जिसके लिए हमारे संस्थान की सदस्यता लेने का प्रावधान  है।

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