Monday, March 11, 2013

प्राचीन परम्पराओं को महिला विरोधी क्यों माना जाता है ?

          अकारण पुरुषों की आलोचना क्यों ?
     महिला दिवस के नाम पर पुरुष वर्ग को कोसा जाना कहाँ तक उचित है?कई टी.वी.चैनलों में इस प्रकार की बिना सिर पैर की बेहूदी बकवास सुनने को मिली जिसमें अकारण पुरुषों की आलोचना की जा रही थी। ये घरों  बिगाड़ने वाली परिचर्चाएँ उन्हीं के द्वारा संचालित होती हैं जिन्होंने अच्छे या बुरे रास्तों से अपने खाने खर्चे के लिए धन खूब  इकट्ठा कर लिया है। ऐसे घरों का पुरुष वर्ग भी या तो अपने घर की महिलाओं की कमाई पर जिन्दा रहने वाला है या उनकी कमाई पर सुख सुविधाएँ भोग रहा है या उनके सुयश से सुरक्षित है।
    अपने पास अधिक पैसे होने के कारण अपनी जड़ों एवं स्वजन सम्बन्धियों से अलग होने के कारण अपना मन मार चुके संकोच बिहीन लोगों ने अपने घर में महिलाओं की आधीनता स्वीकार करते हुए आत्म समर्पण कर दिया है तो ये उनकी परिस्थिति है जो सब पर लागू नहीं की जा सकती।वैसे भी स्त्री हो या पुरुष इस दुनियाँ में  कोई सम्माननीय नहीं होता है केवल उसका गुण ही उसे महान बनाता है-----
                              गुणैर्हि  सर्वत्र पदं निधीयते 
   इसलिए  यदि कोई न कोई गुण है तो उसको  सम्मान मिलेगा ही क्योंकि संसार के सभी लोग किसी न किसी स्वार्थ से जुड़े होते हैं जहाँ  स्वार्थ साधन होता है वहाँ ही संबंध रखते हैं और वहीं सम्मान भावना भी प्रकट करते हैं। वैसे भी जाति, वर्ग,क्षेत्र,समुदाय,संप्रदाय आदि के आधार पर बिना परिश्रम के सुविधा पाने का प्रयास हमेंशा छोटे,अयोग्य या कायर  लोग ही करते हैं फिर भी इन्हें कभी न तो सम्मान मिलता है और न ही ये इसके हकदार ही होते हैं, छोटों का अधिकार स्नेह प्राप्त करने का होता है जो उन्हें मिलना ही चाहिए।
           सेवक     सुख   चह   मान   भिखारी। 
           ब्यसनी  धन  शुभगति  ब्यभिचारी।।   

    अर्थात सेवक को सुख एवं भिखारी को सम्मान  नहीं मिलता है,जिन्होंने कभी किसी प्रकार का आरक्षण नहीं माँगा उनके त्याग के बदले उनको   सम्मान मिलता  है।आरक्षण भोगी किसी व्यक्ति को कभी न तो सम्मान मिला है और न ही आगे मिलेगा।इसी प्रकार  चोरी-छिनारा आदि  किसी भी प्रकार का ब्यसन करने वाले के पास  धन संग्रह  नहीं होता और  दूसरे की स्त्री से संसर्ग करने वाले को शुभ गति नहीं मिलती है।  

       कुछ लोग ऐसे भी हैं जो न तो स्वयं को अपनी घर गृहस्थी में बाँधकर  एक पत्नी व्रती बनाना चाहते हैं न  अपनी पत्नी को ही पतिव्रता  अनसूया बनाना चाहते हैं।ऐसे घरों की बहू  बेटियाँ सारी भारतीय समाज की महिला मुक्ति की मसीहा कैसे कही या मानी जा सकती हैं।सबकी समस्याएँ अलग अलग होती हैं। हर कोई स्वतंत्र है।  
      बहुत महिलाएँ  ऐसी भी हैं जो गरीब हैं जिनका जीवन घर के पुरुष वर्ग की कमाई पर ही आश्रित होता है उन्हें तो पुरुष के अनुसार स्वेच्छया चलना ही होता है उनके माता पिता की भी आर्थिक स्थिति इस तरह की नहीं होती है कि उनका भरण पोषण हो सके। ऐसे में परिश्रम पूर्वक कमाई करके वो अपना भरण पोषण कर सकें न कर सकें ये निश्चित नहीं है। शारीरिक से लेकर आर्थिक आदि सभी विषयों में गलत काम उनके बश का नहीं है उनकी आत्मा गँवारा नहीं करती है।  ऐसे में यदि उन्होंने अपनी परिस्थिति में समझौता कर रखा है हम यदि ऐसा मान भी लेते हैं कि पुरुषों के बनाए खाँचे में उन्हें फिट होना पड़ता है तो इसमें बुराई भी क्या है?आखिर पुरुष वर्ग उनका दुश्मन तो नहीं होता है वही महिला दिवस के नाम पर पिता,भाई,ससुर,पति,पुत्र आदि पुरुषवर्ग के प्रति आम महिला के मन में घृणा  पैदा करना कहाँ तक न्यायोचित है?जबकि रहना साथ साथ है! प्रायः समाज को यदि हम नया कुछ नहीं दे सकते तो पहले से चली आ रही व्यवस्था में बुराई भी क्या है? 
    जिसने न्याय अन्याय से धन इकट्ठा करके अपने सब सुख सुविधा के सारे संसाधन जुटा लिए फिर निकल पड़े समाज सुधारने! आधुनिकता के नाम पर प्राचीन परम्पराओं को छिन्न भिन्न करना क्या और कितना जरूरी है? जब हम नया कुछ दे नहीं सकते तो पुराना बना रहने दें इसमें बुराई भी क्या है?        महिला दिवस पर पुरुषों का विरोध बुराई क्यों?धूपबत्ती मोमबत्तियाँ जलाने बेचारे वो भी जाते हैं! श्रृद्धांजलियों पुरुस्कारों में वो भी भाग लेते हैं!बलात्कारों के विरुद्ध अपराधियों को फाँसी की सजा उन्होंने भी माँगी थी! आन्दोलन में वो भी सहभागी होते हैं धरने प्रदर्शन उन्होंने भी किए थे! पुरुषों का अपराध क्या है?आखिर महिलाओं का  सम्मान पुरुषों की आलोचना के बिना पूरा क्यों नहीं हो सकता है?स्त्री पुरुषों को आपस में मिलजुलकर घरों में क्यों न रहने दिया जाए?  
     जिस  युग  के उदाहरण दे देकर महिलाओं के विरुद्ध पुरुषों को जिस प्रकार से कटघरे में खड़ा किया जाता है। उस युग में भी वैसा नहीं था जैसा आज सिद्ध करने का दुष्प्रयास  हो रहा है अपनी परम्पराओं को हर समय कोसते रहने वाले लोग केवल हीन भावना से ग्रस्त हैं पहले भी यहाँ ऐसा कुछ नहीं होता था जिससे शर्मिन्दा हुआ जाए !  
    उस युग की महिलाएँ स्वयं के कुछ  बनने की अपेक्षा अपने भाई,पति एवं बच्चों को बहुत कुछ बनाने के प्रयास में लगी रहती थीं। जिसका यश भी  उन्हें मिलता था।पिता.पुत्री,भाई.बहन, पति.पत्नी एवं माता.पुत्र जैसे संबंधों का निर्वाह जितने विश्वास एवं सफलता तथा सजीवता पूर्वक कर लेती थीं वह आज दुर्लभ है।विवाह के बाद कुछ महीनों वर्षों तक उन्हें अपनी सासू माता के कठोर अनुशासन में रहना होता था इसके बाद धीरे धीरे उनका अपना रुतबा बनने लगता था और वो स्थापित हो जाती थीं।यहाँ तक कि सासू माता के उस कठोर अनुशासन एवं संयुक्त परिवार और जगह की कमी तथा सामाजिक मर्यादाओं  के कारण उस समय महिलाओं का पति से मिल पाना बहुत कठिन होता था। पुरुष वर्ग अक्सर घरों के बाहर लेटता था एवं स्त्री वर्ग घरों के अन्दर लेटता था।
     बनारस के हमारे एक गुरू जी थे उन्होंने  पुरानी मर्यादाओं की बात करते हुए एक बार बताया था  कि उनके पास एक ही अँगौछा था नहाकर उससे ही  शरीर पोछना होता था, सुखा कर उसेही  शिर में बाँधना होता था, कहीं बिछा कर बैठने के काम भी आ जाता था अँगौछा । एक ही अँगौछा था पैसे भी उतने नहीं थे कि इतनी आसानी से दूसरा खरीद लिया जाए।ऐसा बहु उपयोगी अँगौछा लेकर बनारस से अपने गाँव बलिया स्थित अपने घर गए, वहाँ रात में  बिस्तर पर भूल बश अँगौछा छूट गया।अगले दिन सुबह उन्हें वापस बनारस लौटना था, किन्तु उस समय की सामाजिक परम्पराओं एवं मर्यादाओं के कारण  एकांत मिलन न संभव हो पाने से हमारी गुरुमाता वह अँगौछा हमारे गुरु जी को नहीं दे पाईं। इसके बाद शर्दी आदि के छै महीने गुरू जी को बिना अँगौछे के कठिनाई पूर्वक निकालने पड़े।  जब दूसरी बार घर आए तब उन्हें वह अँगौछा मिल सका। यहाँ एक और कठिनाई का सामना हमारी गुरुमाता को और करना पड़ा।  जब छै महीने बाद गुरू जी को वापस आना था तब तक वह अँगौछा छिपा कर रखते कहाँ?कोई देख लेता तो यही होता कि ये तुम्हें कैसे मिला? उस समय नन्द एवं सासु आदि महिलाएँ बहुओं के सामानों की तलाशी भी ले लिया करती थीं। इसलिए उस अँगौछे को गेहूँ आदि में छिपा छिपा कर किसी प्रकार समय निकलना पड़ा! 
    मेरे कहने का अभिप्राय यह है कि ये उस समय की परम्पराएँ एवं मर्यादाएँ आदि ऐसी ही थीं। उस समय युवा जोड़ों पर इस प्रकार का अनुशासन बयो बृद्धों के द्वारा रखा जाता था ! उस समय की ये मर्यादाएँ स्त्री पुरुषों ने मिलकर बनाई एवं थीं।देवरानी-जेठानी,नन्द- भौजाई,सासु-बहू आदि में विवाद होते थे एवं इन्हीं के अनुशासन में नई बहू को रहना होता था। पुरुषों ने महिलाओं को बंधन में रखा ये पुरुषों के ऊपर गलत आरोप है। पुरुष तो लुकछिप कर कभी कभी अपनी पत्नी से मिल ही पाया  करते थे  वो अत्याचार कैसे करते?यदि कहीं किसी महिला को कोई पीड़ा हुई भी होगी तो उसकी जिम्मेदार कोई महिला ही होगी। 
    वर्तमान समय में भी यहाँ तक कि अपनी विवाहिता पत्नी को छोड़कर जो लोग  प्रेम प्यार नाम का ड्रामा करते करते किसी अन्य महिला के चक्कर में फँस जाते हैं इसप्रकार घर में विवाहिता पत्नी और बच्चे उस एक महिला के दुष्कर्म के द्वारा दी गई पीड़ा के शिकार हुए।इसमें पुरुष निर्दोष नहीं है किन्तु बहिष्कार करने लायक ऎसे पुरुषों के जाल में फँस कर जिस महिला ने भी निंदनीय काम ही किया है फिर महिलादिवस के नाम पर केवल पुरुष विरोध क्यों?
    राजेश्वरी प्राच्य विद्या शोध संस्थान की सेवाएँ  


यदि आप ऐसे किसी बनावटी आत्मज्ञानी बनावटी ब्रह्मज्ञानी ढोंगी बनावटी तान्त्रिक बनावटी ज्योतिषी योगी उपदेशक या तथाकथित साधक आदि के बुने जाल में फँसाए जा  चुके हैं तो आप हमारे यहाँ कर सकते हैं संपर्क और ले सकते हैं उचित परामर्श ।

       कई बार तो ऐसा होता है कि एक से छूटने के चक्कर में दूसरे के पास जाते हैं वहाँ और अधिक फँसा लिए जाते हैं। आप अपनी बात किसी से कहना नहीं चाहते। इन्हें छोड़ने में आपको डर लगता है या उन्होंने तमाम दिव्य शक्तियों का भय देकर आपको डरा रखा है।जिससे आपको  बहम हो रहा है। ऐसे में आप हमारे संस्थान में फोन करके उचित परामर्श ले सकते हैं। जिसके लिए आपको सामान्य शुल्क संस्थान संचालन के लिए देनी पड़ती है। जो आजीवन सदस्यता वार्षिक सदस्यता या तात्कालिक शुल्क  के रूप में  देनी होगी जो शास्त्र  से संबंधित किसी भी प्रकार के प्रश्नोत्तर करने का अधिकार प्रदान करेगी। आप चाहें तो आपके प्रश्न गुप्त रखे जा सकते हैं। हमारे संस्थान का प्रमुख लक्ष्य है आपको अपने पन के अनुभव के साथ आपका दुख घटाना बाँटना  और सही जानकारी देना।

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