Sunday, 12 May 2013

अब प्यार पवित्र नहीं रहा इसलिए बंद हो यह खेल !

          क्या नग्नता का ही अर्थ प्यार है?

    प्यार का अर्थ शास्त्रों में तो बहुत कुछ अलग है जिसका अर्थशास्त्रों में परमात्मा बताया गया है।नारद भक्ति सूत्रं में प्रेम के विषय में कहा गया है

       गुणरहितं कामनारहितं बर्धमानं  अविच्छिन्नं सूक्ष्मतर अनुभव रूपं  प्रेम इति निगद्यते।
      इसका अर्थ होता है कि जो आपसे प्रेम करता है वो यदि आप के गुणों से प्रभावित नहीं है, वो आपसे किसी स्वार्थ से नहीं जुड़ना चाहता है,उसका प्रेम दिनों दिन बढ़ता है कभी कम नहीं होता है, आपके विरोध में कभी सोचता भी नहीं है, वो आपको कभी अहसास भी नहीं कराता है कि वो उसे चाहता है किन्तु फिर भी आपसे स्नेह करता है वो आपका सच्चा प्रेमी या प्रेमिका हो सकते हैं ।


       सेक्स के लिए चूमते चाटते घूमने वाले कामी हैं ये प्रेमी कैसे कहे जा सकते हैं?जो प्रेम करेगा वो सेक्स तो बहुत बड़ी बात है एक कण का भी स्वार्थ नहीं रखेगा क्योंकि स्वार्थ आते ही वह प्रेम पवित्र नहीं रह जाता है जो पवित्र नहीं है वह अपवित्र  प्रेम परमात्मा भी नहीं हो सकता है उसके परिणाम भी अच्छे नहीं होंगे स्वाभाविक है।

     आचार्य राम चन्द्र शुक्ल जी ने प्रेम की परिभाषा दूसरे ढंग से की है।उन्होंने कहा कि जब संसार के सभी जीवों से बिना पक्षपात के आप एक जैसा प्रेम करते हैं तो आप भक्त होते हैं।जब आप अपने घर के  या निजी संबंधों से जुड़े किसी व्यक्ति से प्रेम करते हो  वो आपसे करे या न करे तो इसे मोह कहते हैं।जब आप  किसी चीज से प्रेम करते हो इसे लोभ कहते हैं।

       इसीप्रकार जब आप किसी को चाहें और वो आपकी चाहत को माने ही न तो वह एकांगी प्रेम  होता है जैसे मछली पानी से प्रेम करती है किन्तु पानी मछली से प्रेम नहीं करता है इसी प्रकार पतिंगा दीपक से प्रेम करता है किन्तु दीपक तो पतिंगे से नहीं करता है। मछली अपने प्रेमी पानी से अलग होकर एवं पतिंगा अपने प्रेमी दीपक की आग से चिपक मर जाते हैं।बलात्कार में भी एकांगी प्रेम ही होता है एक ही के चाहने के कारण बस वही चिपक लगता है और ऐसे एकांगी प्रेम में प्रेमी से मिलकर भी मौत ही होती है ऐसे ही प्रेमी से बिछुड़कर भी मौत होती देखी जाती है।ऐसी परिस्थिति में बलात्कार को भी एकांगी प्रेम माना जाता है एकांगी प्रेम में मृत्यु होती ही है।किसी के ऊपर तेजाब आदि फेंकने की घटनाएँ भी इसी  एकांगी प्रेम का ही परिणाम होती हैं।इसीलिए भड़काऊ या अर्द्धनग्न शरीर वाले कपड़े नहीं पहनने चाहिए।कई बार यह  प्यार भी बलात्कार का कारण बनता है।

     जब कोई लड़की किसी स्वार्थ में आकर किसी लड़के को अपना शरीर सौंपती है प्रारंभ में तो यह संबंध समझौता पूर्वक चलता है।चूँकि इस तरह के संबंधों की नींव ही सम्पूर्ण रूप से झूठ पर आधारित होती है दोनों ने एक दूसरे से खूब झूठ बोला होता है जैसे जैसे सम्बन्ध आगे बढ़ते हैं एक दूसरे की सच्चाई भी एक दूसरे के सामने आने लगती है।इसलिए जब स्वार्थ बाधित होने लगता है तो लड़कियाँ किनारा करने लगती हैं किन्तु लड़के छोड़ना नहीं चाहते हैं।ऐसे समय लड़कियाँ बलात्कार का केस लगाने की धमकी देती हैं जबकि लड़कों ने उनके साथ अश्लील सीडी बना रखी होती है इसप्रकार जब दोनों ही दोनों को धमकी देने लगते हैं  तब तक दोनों के घर वालों को दोनों के विषय में कुछ पता नहीं होता है अक्सर इस मोड़ पर पहुँचे जोड़े का सकुशल वापस पीछे लौट पाना बहुत कठिन होता जाता है।इसी प्रकार किसी ऐसे ही जोड़े के बीच जब कोई तीसरा या तीसरी आ जाए तब जोड़े के दोनों  सदस्यों को एक दूसरे के साथ एकांत में घूमना, फिरना, बैठना, उठना बिलकुल बंद कर देना चाहिए न जाने कौन किसका कब कहाँ गला दबा दे! ऐसी परिस्थिति में एक दूसरे पर विश्वास करना अत्यंत कठिन एवं दुखद होता है। महाभारत में कहा गया है कि
      परभावानुरक्ता  हि नारी ब्यालीमिवस्थितम्||
                                                              -महाभारत
    अर्थात किसी  जोड़े का कोई सदस्य जब किसी और पर आशक्त ;फिदा हो जाता या जाती है ऐसे पराशक्त लड़के या लड़कियों को सर्प एवं सर्पिणी मानकर इन पर भरोसा कभी नहीं करना चाहिए। 
  
 

     क्या नग्नता का ही अर्थ प्यार है?यदि यह सच है तो प्यार करने वालों को फाँसी की माँग ही क्यों? किस्तों में कपड़े उतारने का नाम है प्यार, कला, कामेडी  और  फिल्म।यदि कोई अपनी सेक्स भावना को घर के अंदर अनुशासन में रखते हुए पत्नी तक सीमित रखता है तो वह सदाचारी गृहस्थ है।जो लोग अपनी सेक्स भावना की नदी को सँभाल नहीं पाते और यह भावनात्मिका नदी  घर से बह कर बाहर  निकल पड़ती है और  बाहर जाकर आफिस, पार्क, पार्किंगों, कालेजपरिषरों या किन्ही और शुनसान स्थलों में किसी सेक्सालु जीव से टकराती है तो प्यार उसे कहा  जाता है और किसी भले,चरित्रवान, ईमानदार स्त्री पुरुष से टकराई तो बलात्कार! क्योंकि वो मूल्यों के आधार पर जीवन जीने वाला होगा और कोई चरित्रवान स्त्री पुरुष क्यों सहेगा किसी का  प्यार वाला  प्यारा  प्यारा दुर्व्यवहार?यदि आप अपनी इसी  सेक्स  भावना  को अभिव्यक्ति  के  माध्यम  से  किसी   मंच  तक  पहुँचा  पाने  में सफल  हो  जाते  हैं  तो  लोग  आपको अश्लील फूहड़ बेशर्म आदि कुछ भी कहने लगते हैं किन्तु यही सेक्स भावना का  मंच यदि टी.वी.पर दिखाई पड़े तो ये कला का रूप धारण कर लेती है और यदि इसी भावना के प्रकटीकरण में सामाजिक मर्यादाओं की धज्जियाँ उड़ाई जा रही हों तो इसे कामेडी प्रोग्राम कहते हैं।इन सब बातों व्यवहारों परिधानों को अभिनयात्मक किसी कहानी में गढ़ कर  प्रेरणा देने में यदि कोई सफल हो जाता  है तो इसे फ़िल्म कह लिया जाता है किन्तु इन सब बातों के मूल में भावना तो वही एक सेक्स भावना ही  है।इन सब झमेलों से बचने का एक मात्र साधन है उत्तम शिक्षा !   शिक्षित व्यक्ति सदाचारी होता है शिक्षा मानव जीवन का आवश्यक अंग है पुराने ऋषि तो  कहा करते थे कि   

                       विद्या विहीनः पशुः
     अर्थात बिना पढ़े लिखे व्यक्ति की तुलना पशुओं से की गई है।एक जगह तो यहाँ तक लिखा गया कि ऐसे लोग धरती का बोझ हैं   
                     ते मृत्यु लोके भुवि भार भूता
     यहाँ एक बात ध्यान देने लायक अवश्य है कि चारित्रिक संयम सदाचार आदि गुणों को अपने जीवन में स्वयं संग्रह करना चाहिए।शिक्षा ली ही इसीलिए  जाती  है यही शिक्षा का फल भी है जो लोग पढ़ लिख कर भी बलात्कार करते हैं, बेलेन्टाइन डे मनाते या तथाकथित प्यार का खेल खेलते घूमते हैं। ये उनके शिक्षित होने का फल नहीं है, क्योंकि यदि आप किसी की बहन बेटी के साथ प्यार का खेल खेलेंगे तो कोई आपकी बहन बेटी को भी अपनी हबस का शिकार बनाएगा।यदि उसको अपने  गुणों से नहीं प्रभावित कर पायेगा तो दुर्गुणों से करेगा,बलात्कार करेगा।आखिर उसे भी अपनी बहन बेटी के साथ हुए दुर्व्यवहार का बदला जो लेना है।बहन बेटी की इज्जत को वो अपने स्वाभिमान या आत्म सम्मान से जोड़कर देखता है।ये भारत वर्ष है यहाँ अभी भी लोग इतने बेशर्म नहीं हुए हैं कि बलात्कार और बेलेन्टाइन डे के नाम पर अपनी  बहन बेटी की इज्जत के साथ खिलवाड़ होने दें । ये भारत वर्ष का इतिहास रहा है इसी भावना पर हजारों राजा महाराजा शहीद हो गए।हजारों रियासतें तवाह हो गईं।यह हर किसी को  अपनी  बहन बेटी के साथ होता देखकर बहुत  बुरा लगता है।ऐसी स्थिति में लोग मार पीट से लेकर हत्या तक सब कुछ कर देना चाहते हैं।ऐसी परिस्थिति में एक व्यक्ति की चारित्रिक  गड़बड़ी  के कारण  बलात्कार से लेकर  हत्या तक सब कुछ तो हो गया।ऐसी बदले की भावना के विरुद्ध फाँसी जैसी सजा का भी कोई भय नहीं होगा।इसलिए यह मानना चाहिए कि  विद्या का फल इतना डरावना कभी हो ही नहीं सकता है। विद्या तो सुख शांति संयम सदाचार आदि गुणों से संपन्न करती है।विद्या तो सेक्स अर्थात बासना पर आत्म नियंत्रण  की क्षमता प्रदान करती है।
     इस समय सेक्स एजूकेशन देने की बात चल रही  है यह समझ में नहीं आता है कि एजूकेशन से सेक्स का सम्बन्ध आखिर क्या है?सेक्स तो एजूकेशन  का विरोधी है फिर इसकी एजूकेशन  क्या होगी।कुत्ते बिल्लियों से लेकर सभी पशु पक्षी तक अनादि काल से बिना एजूकेशन  के सेक्स कर रहे हैं सबके समय से बच्चे हो रहे हैं किसी को कोई तकलीफ नहीं हैं।जो जितना नंगा हो वह उतना फैशनेबल या उतना बड़ा कलाकार इसीप्रकार जितना अधिक अश्लील बोल ले उतना बड़ा कामेडियन आदि माना जाता है।इसमें मनुष्य तो डर डर कर थोड़े  थोड़े कपड़े उतार रहा है किन्तु  पशु पक्षी तो पहनते ही नहीं हैं वो हमसे कितने आगे निकल गए हैं कुत्ते बन्दर बिल्ली तो झाड़ी जंगल भी नहीं ढूंढते  उन्हें तो जहाँ कहीं प्यार लगा वहीं शांत कर लेते हैं।जिसमें कुत्ते तो लोगों को दिखा दिखाकर कई कई घंटे प्यार करते हैं।इसके बेलेन्टाइन डे की बराबरी कैसे की जा सकती है? सेक्स एजूकेशन के कम्पटीशन में कुत्ते और बन्दर सबसे पहले विजयी हो सकते हैं क्योंकि शास्त्रों ने इन्हें सबसे अधिक कामी माना है।इसलिए इनके बेलेन्टाइन डे की बराबरी बेचारा मनुष्य सौ साल बाद भी नहीं कर सकता है। मेरे कहने का अभिप्राय मात्र इतना है कि जिस रेस में हम पशु पक्षियों से भी हारेंगे ही जब यह निश्चित ही है तो उस रेस में भाग लेना हमारी बुद्धिमानी नहीं है।इसलिए हमें मनुष्य बनने में ही भलाई है।यही एक ऐसा क्षेत्र है जिसमें पशु पक्षी हमारी बराबरी नहीं कर सकते हैं।मनुष्यता आवे न आवे कम से कम  उनसे हारने से तो बच ही जाएँगे।यही सब सोचकर हम प्रेम वेम पर भरोसा नहीं करते और अपनी इज्जत बचाए अपने घर बैठे रहते हैं और जिसको जैसा लगे वो वैसा करे हमारी किसी से कोई शिकायत नहीं है ये सब तो मैंने अपने मन की अपनी बातें रखी हैं।कोई सहमत या असहमत होने के लिए स्वंतत्र है।फिलहाल अब मैं मनुष्य बनने के सूत्र ढूंढ़ रहा हूँ।इस विषय में महात्मा वाल्मीक ने तो यहाँ तक कहा है कि
                   
                   तपः स्वाध्याय निरतम्  


    अर्थात् सम्पूर्ण मनुष्योचित गुणों के विकास के लिए शिक्षा और तपस्या दोनों ही अत्यंत आवश्यक हैं।संभवतः उनका उद्देश्य रहा होगा तप प्रभाव से पढ़ने लिखने वाले या पढ़े लिखे लोग बलात्कार जैसी जघन्य वारदातों में सम्मिलित नहीं होंगे आजकल अक्सर  कई बड़े बड़े पदों पर बैठे लोग भी बलात्कार या व्यभिचार में सम्मिलित पाए जाते हैं। कुछ पकड़ जाते हैं बाकी सबकी मुंदी ढकी चलती रहती है।उसका कारण है कि बड़े पदों पर बैठे लोगों का  व्यभिचार तो तब तक पवित्र रहता है जब तक वो जिसे जो काम करवाने का आश्वासन या लालच देते हैं वो करा पाते हैं फिर उन्हें उसके साथ कुछ भी कर लेने का अधिकार हो जाता है यद्यपि उसे  बलात्कार  नहीं तो व्यभिचार तो कहा ही जा सकता है किन्तु वो लोग इस व्यभिचार को प्यार नाम से प्यारपूर्वक  बुलाते हैं जो कहने सुनने में अच्छा लगता है।


     राजेश्वरी प्राच्य विद्या शोध संस्थान की सेवाएँ  

यदि आप ऐसे किसी बनावटी आत्मज्ञानी बनावटी ब्रह्मज्ञानी ढोंगी बनावटी तान्त्रिक बनावटी ज्योतिषी योगी उपदेशक या तथाकथित साधक आदि के बुने जाल में फँसाए जा  चुके हैं तो आप हमारे यहाँ कर सकते हैं संपर्क और ले सकते हैं उचित परामर्श ।

       कई बार तो ऐसा होता है कि एक से छूटने के चक्कर में दूसरे के पास जाते हैं वहाँ और अधिक फँसा लिए जाते हैं। आप अपनी बात किसी से कहना नहीं चाहते। इन्हें छोड़ने में आपको डर लगता है या उन्होंने तमाम दिव्य शक्तियों का भय देकर आपको डरा रखा है।जिससे आपको  बहम हो रहा है। ऐसे में आप हमारे संस्थान में फोन करके उचित परामर्श ले सकते हैं। जिसके लिए आपको सामान्य शुल्क संस्थान संचालन के लिए देनी पड़ती है। जो आजीवन सदस्यता वार्षिक सदस्यता या तात्कालिक शुल्क  के रूप में  देनी होगी जो शास्त्र  से संबंधित किसी भी प्रकार के प्रश्नोत्तर करने का अधिकार प्रदान करेगी। आप चाहें तो आपके प्रश्न गुप्त रखे जा सकते हैं। हमारे संस्थान का प्रमुख लक्ष्य है आपको अपने पन के अनुभव के साथ आपका दुख घटाना बाँटना  और सही जानकारी देना। 

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