Tuesday, 2 July 2013

घूंस का धंधा सरकार के सारे विभागों में फल फूल रहा है !

सरकारी  विभागों  में कामचोरी और घूस खोरी से     

                    परेशान है आम समाज !!!


     बंधुओं,आज भारतीय समाज में  सभी प्रकार के अपराधों की बाढ़ सी आ गई जिसमें सभी वर्ग के एक से एक दिखने में ईमानदार लगने वाले बेईमान लोग भारतीय समाज को शर्मशार कर देने वाली हरकतें बड़ी निर्भीकता पूर्वक करते जा रहे हैं। ऐसे लोग आतंकवादी और नक्सली ज़रूर नहीं हैं किन्तु  अपराधियों का निर्माण करने में उनकी बड़ी भूमिका है। एक आम आदमी को अपराधी बनने की परिस्थिति में पहुँचने के लिए ऐसे लोग जिम्मेदार जरूर हैं!इन लोगों की आत्मा इतनी मर चुकी है कि बारीकी से जाँच होने पर बड़े से बड़े अपराधों  में इनकी भूमिकाएँ मिलेंगी । अब तो लगने लगा है कि कठोर से कठोर कानून भी इनका क्या बिगाड़ सकते हैं ?अपराधियों के लिए लोग फाँसी की माँग करने  लगते  हैं  ऐसे लोगों के गंदे इरादों के सामने क्या मायने रखती है फाँसी?  

    बलात्कार,भ्रष्टाचार,हत्या,अपहरण,लूट से लेकर सरकारी कर्मचारियों में बढ़ते  घूस के प्रचलन ने सरकारी हर विभाग में कामचोरी और घूस खोरी जैसा भयंकर हाहाकार मचा रखा है।गरीब आदमी का सारा हक़ एवं अनुदान का सर्वाधिक हिस्सा सरकारी कर्मचारी और नेता या दलाल खाए जा रहे हैं सरकारी कर्मचारी दलालों के काम सुनते हैं आम आदमी कुत्ते बिल्ली की तरह दुत्कार कर भगा दिए  जाते  हैं,  उसे घंटों प्रतीक्षा में बैठाया जाता है, उसके कागजों में कमी बताकर उसे तब तक लौटाया जाता है जब तक वो घूँस का इंतजाम करके नहीं दे देता है।गरीबों के बच्चे रोते  बिलबिलाते घूमा  करते  हैं उनके हिस्से का अनुदान मक्कार लोग खा रहे होते हैं?लोन लेने तक में उन गरीबों से घूस माँगी जाती है।यह बात सबको पता है फिर भी सब कुछ चल रहा है।इनमें भी कई बार कोई ईमानदार अधिकारी-कर्मचारी मिल जाते हैं वो जब अपने विभागों की सच्चाई बताते हैं तो रोंगटे खड़े होते हैं कि क्या चल रहा है सरकारी विभागों में !इन विभागों में भी कुछ लोग अभी भी हैं जिनकी आत्मा अभी भी जीवित है वो भी अपने विभागों के कामचोर और घूस खोर लोगों से तंग हैं घुट रहे हैं किन्तु उनकी शिकायत किससे करें बहुमत उनका है ऐसे ही एक अफसर ने अपनी पीड़ा बताते हुए कहा -

  अधिकारी इतने मक्कार हैं कि वे बाहर निकल कर देखना नहीं चाहते हैं कि बाहर क्या हो रहा है। उनके आधीन कर्मचारी बड़ी निर्भीकता पूर्वक कहते हैं कि कहीं जा कर शिकायत कर दो कोई नहीं सुनेगा सबका हिस्सा बँधा है वो समय से पहुँच जाता है तो कोई पागल थोड़ा जो गर्मी में बाहर निकलेगा ! 

      अपराधियों के लिए लोग फाँसी की माँग करने  लगते  हैं किन्तु अपराधियों को तैयार करने वालों के लिए है कोई सजा है क्या! यदि नहीं तो कितने भी शक्त कानून बना लो क्या होगा?कितने लोगों को लटका दोगे फाँसी पर?फिर तैयार कर दिए जाएँगे अपराधी! जब तक अपराधी तैयार करने वाली फैक्ट्रियाँ बंद नहीं की जातीं! यदि ऐसा न होता तो इतने कठोर कानून और बड़े बड़े आंदोलनों के बाद भी महिलाओं के विरुद्ध अपराध रुकने का नाम ही नहीं ले रहे हैं आखिर क्या कारण है। ऐसे लोगों के गंदे इरादों के सामने क्या मायने रखती है फाँसी?

       जो सरकारी कर्मचारी या अधिकारी समय से और ईमानदारी पूर्वक अपनी ड्यूटी नहीं निभाते हैं या घूस लेकर काम करने के आदी हो गए हैं सारी समस्याओं की जड़ ऐसे लोग हैं।सारा समाज इन्हें देख देख कर मक्कारता की ओर बढ़ने लगा है।

   इनकी ऐश आराम,कामचोरी,घूसखोरी से जुटाई गई सुख सुविधाओं को देखकर पढ़ने लिखने वाला नौजवान तो सोचता है कि मेहनत से पढ़ाई करके मैं भी ऐसा ही बनूँगा  जहाँ बिना कुछ काम के दबाव के ही सैलरी की सुविधा होगी ऐश आराम की जिंदगी होगी।इस प्रवृत्ति पर नकेल कसे बिना अपराधों पर कंट्रोल कर पाना असंभव ही नहीं सौ बार असंभव है।क्योंकि कामचोरी घूसखोरी की इनकी आदत ने ही बिना पढ़े लिखे बिना परिश्रम किए ऊँचे ऊँचे  सपने पालने वाले नौ जवानों को अपराध की ओर मोड़ ने का काम किया है उन्हें पता होता है किस प्रकार के अपराध से बचने के लिए कितने पैसे किसको देने होंगे उतने पैसों का इंतजाम करने के बाद वह किसी भी प्रकार का अपराध करने के लिए स्वतंत्र होता है! बस पर करे या ट्रेन पर या जहाज पर ही क्यों न करे अधिक से अधिक कुछ पैसे और लग जाएँगे!यही वह भावना है जिससे अपराधी पकड़े जाने के बाद भी भयमुक्त होते हैं!                       

        गरीब आदमी कैसे पाले अपने बच्चे और कैसे अपने माता पिता होने का गौरव सुरक्षित रखे ?

          कैसे पालें बच्चे ?
    बिना धन के इस दुनियाँ में कुछ भी संभव नहीं है धन जिसके पास  है ही नहीं उसे तो हर क्षण घुट घुट कर जीना होता है 
कैसे दें बच्चों को शिक्षा?
    सरकारी प्राथमिक स्कूलों में पढ़ाई नहीं होती और प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाने के लिए धन नहीं होता है। 
       एक मोची के लड़के को पूर्वी दिल्ली के नगर निगम के एक सरकारी प्राथमिक स्कूल के अध्यापक के बच्चे ने मोची के लड़के से कहा कि तू तो मोची का लड़का है इसलिए अछूत है।यह सुनकर उस बच्चे ने तपाक से कहा कि  मेरे  पिता जी तो काम के पैसे लेते  हैं  मेहनत से काम करते  हैं मैं अपनी आँखों से देखता हूँ। वो अपने परिश्रम से पवित्र हैं वो अछूत हो ही नहीं सकते  । मैं उन पर और उनकी कमाई पर गर्व करता हूँ । 
        हाँ,मेरी माँ मुझे तेरे साथ रहने को  जरूर रोकती है कि कहीं हमारे संस्कार न बिगड़ जाएँ! क्योंकि  तेरे पिता जी सरकारी स्कूल में मास्टर हैं।तेरे यहाँ बिना मेहनत की सैलरी आती है तुम लोग खूब खर्च करते हो।अच्छी अच्छी  चीजें खाते पहनते हो तुम्हारे पास साईकिल भी है।यदि तुम्हें देखकर ये सब खाने पहनने का शौक हमें भी लगा तो हम भी चोरी चकारी करते घूमेंगे! 
      अछूत तो  तू  है । यही कारण है कि हमारे मोची गिरी के काम से समाज इतना अधिक संतुष्ट है कि मोचियों की नियुक्ति के लिए न कभी कोई आन्दोलन होता है और न ही नियुक्ति। ऐसे ही तेरा बाप भी यदि बच्चों को पढ़ाता ही होता तो प्राइवेट विद्यालय खुलते ही क्यों?तेरा  बाप जिन पैसों से तुझे रोटी खिलाता है उनके बदले बच्चों को पढ़ाता कुछ भी नहीं इस लिए वो अछूत है किन्तु हमारा बाप हमें अपनी मेहनत की कमाई खिलाता है इसलिए वो अछूत हो ही नहीं सकता!जिस दिन प्राइवेट स्कूलों को छोड़कर बच्चे सरकारी स्कूलों में एडमीशन लेने लगें उस दिन समझ लेना कि अब तेरे बाप ने भी पढ़ाना शुरू कर दिया है और अब वह अछूत नहीं रहा !
          जो अपने कर्तव्य का पालन करते हैं वो अछूत हो ही नहीं सकते !
  कैसे दें बच्चों को धार्मिक संस्कार  ?
      आज बाबा बैरागी लोग तक धन इकठ्ठा करने के लिए पागल हुए मारे मारे फिर रहे हैं भागवत कहने वाले मुख मटकाते कमर हिलाते तबले ठोंकते फिर रहे हैं यदि केवल पैसे की भूख न होती तो बन्दर बनने की जरूरत क्या थी?जिसके पास पैसे ही न हों उसे या उसके बच्चों को कौन दे धार्मिक संस्कार ?

      कैसे करें देख भाल बच्चों के स्वास्थ्य की ?

     सरकारी चिकित्सा तो केवल कागजों पर चलती है दवाएँ बेचने के लिए ही भेजी जाती हैं यदि सरकारी चिकित्सा में दम ही होती तो क्यों बढ़ते जाते प्राइवेट अस्पताल ?

    सरकार के सारे विभागों का यही हाल है!







          

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