Thursday, 18 July 2013

Sarkari Skulon Men Itni Hoti Hai Laparwahi !

सरकारी विद्यालयों की नौकरी पाकर कौन करना चाहता है काम ? 

   जब सरकारी विद्यालयों के भोजन और दवाओं में इतनी लापरवाही होती है तो शिक्षा क्या होती होगी भगवान ही मालिक है! कौन पढ़ाता होगा क्या कहा जाए नीचे से लेकर बड़े से बड़े अधिकारियों को सब कुछ पता होता है कि हमारे स्कूलों में पढ़ाई नहीं होती है।उनके शिक्षकों कर्मचारियों की लापरवाही जानते समझते हुए भी शिकायतें आने पर भी अपनी अपनी आफिसें छोड़ कर नहीं जाना चाहते या नहीं जाते हैं अधिकारी !यदि निकल कर जाते ही होते तो उनका भय होता शिक्षकों एवं सम्बंधित कर्मचारियों को !कभी कभी भी स्कूलों में झाँकने जाते होते तो कुछ तो भय होता कम से कम मिड डे मील योजना से बच्चों की जानें तो न जाने पातीं! 

       ये शिक्षा अधिकारी तो राजा महाराजाओं से भी आगे हैं उन्हें तो युद्ध में लड़ने भी जाना होता था प्रजा पालन करना भी उनकी जिम्मेदारी हुआ करती थी किन्तु सरकारी शिक्षा के अधिकारियों ,शिक्षकों एवं सम्बंधित कर्मचारियों को केवल एक ही काम होता है कि अपने से सीनियर को कैसे खुश रखा जाए ! बस इसी पर चर्चाएँ,विचार गोष्ठियाँ आयोजित होती रहती हैं।अध्यापकों से लेकर अधिकारियों तक की शैक्षणिक जिम्मेदारी का ऐसा बुरा हाल है कि जब जो जहाँ अपनी ड्यूटी पर न मिले तो उनके सहायक छोटे बड़े सहयोगी सब एक ही बात कहते मिलेंगे वो मीटिंग में गए हैं बड़े साहब ने या मंत्री जी ने बुलाया है ताकि उन्हें पूछने वाला डर कर चला जाए!और ऐसा ही होता भी है!

     आखिर कैसी मीटिंग, किसलिए मीटिंग,जब स्कूलों के भोजन में मक्खी,मच्छर ,कीड़े, मकोड़े मिलते चले जा रहे हैं भोजन में इतनी दुर्गन्ध कि बच्चे अपनी नाक में कपड़े लगाकर वही खाना खा रहे हैं तो क्या होती होगी पढ़ाई ?फिर भी मीटिंगें !यही तो सरकारी काम काज की विशेषता होती है कि यहाँ काम हो न हो पर मीटिंग होनी जरूरी है ताकि झूठ को भी सच सिद्ध करने के लिए एक जैसा बोलना बहुत जरूरी है इसलिए मीटिंग में ही यह निर्णय लिया जाता है किस विषय पर किसको क्या बोलना है!इसलिए मीटिंग बहुत जरूरी है ! 

        आज मीडिया वाले हजारों विद्यालयों के बच्चों को मिलने वाले भोजन का सैम्पल दिखा रहे हैं अक्सर स्कूलों के भोजन में मक्खी,मच्छर ,कीड़े, मकोड़े मिल रहे हैं कहीं कहीं तो भोजन में इतनी दुर्गन्ध कि बच्चे अपनी नाक में कपड़े लगाकर वही खाना खा रहे हैं। ये लगभग हर जगह के हर विद्यालय का हमेंशा का खेल है जब जहाँ जो पकड़ गया सो पकड़ गया अन्यथा सौ इमानदारों का ईमानदार !भोगना तो बच्चों को पड़ता है। कैसे खाते होंगे छोटे छोटे बच्चे वो सड़ा गला भोजन !वाह  भाई वाह!यह कैसा शिक्षा का अधिकार और कैसी मिड डे मील योजना?

     सुना है कि अब से स्कूलों  के प्रधानाचार्यों   या शिक्षकों को भी मिड डे मील का भोजन चखना होगा सरकार ऐसा कुछ नियम बनाने जा रही है।भोले भाले बच्चों एवं उनके अभिभावकों को भरमाने की यह एक और योजना है।जब अध्यापक स्कूल में आएँगे, लंच के समय तक  भी विद्यालय में उपस्थित रहेंगे फिर भी चखें न चखें ये उनकी मर्जी !कौन जा रहा है उन्हें देखने ?और देखे तो भी क्या कर लेगा कोई ?आखिर सरकारी नौकरी है मुश्किल से मिली है फिर भी इंज्वाय भी न करें !

    सरकार जितने पैसे की कोई  योजना बनाती है उससे अधिक उसके विज्ञापन पर खर्च करके लोगों के मन में उस योजना के प्रति विश्वास पैदा करती है उसके बाद भूल जाती है सरकार !इसके बाद सरकारी कर्मचारियों के हाथों कैसे होता है उस योजना का विस्तार उसका कितना लाभ मिलता है जनता को और कितना लाभ उठाते हैं सरकारी कर्मचारी?यह देखने के लिए ऊपर से कोई अधिकारी या कोई सरकारी नुमाइन्दा  नहीं आता है झाँकने कि कैसे चल रही है योजना ?धीरे धीरे मिड डे मील वाला हाल सरकारी हर योजना का होता है दम तोड़ती जाती हैं योजनाएँ !इनके बदले नीचे से ऊपर की ओर चलने वाला श्रद्धा पूर्वक प्राप्त धनात्मक सहयोग सरकारी दल चुनाव जीतने के लिए उन योजनाओं के प्रचार प्रसार पर अंधाधुंध खर्च कर रहे होते हैंवही पैसा !      

      अगर इस दूषित भोजन प्रक्रिया की भी ईमानदारी पूर्वक जाँच कराई जाए तो मेरा अनुमान है कि इसके तार ऊपर से ऊपर तक जाते दिखाई देंगे!आश्चर्य है सब जगह एक जैसा हाल !वो तो मीडिया वाले आज दिखा रहे हैं होता तो हमेंशा ऐसा ही होगा किन्तु मीडिया को भी सरकारी स्कूली बच्चों की दुर्दशा पर हमेंशा दया कहाँ आती है किसको  होती है सरकारी स्कूली बच्चों के भविष्य की चिंता !

   जब सरकारी विद्यालयों में कोई देखने सुनने वाला नहीं है किसी की किसी भी प्रकार की कोई जिम्मेदारी ही नहीं है। बच्चे स्कूलों में जाते हैं भोजन वाले भोजन दे जाते हैं बच्चे खा लेते हैं अध्यापकों को समय मिला तो स्कूलों में  या कक्षाओं में चक्कर लगा गए कुछ राइटिंग वगैरह लिखने को बता गए नहीं समय मिला तो कोई बात नहीं !अभिभावक कुछ कह नहीं सकते अधिकारी कोई आता नहीं है आता भी है तो चाय पानी करके चला जाता है कक्षाओं में गया भी तो चला गया बस ड्यूटी पूरी हो गयी!वापस लौट गया अधिकारी !क्या यही है शिक्षा का अधिकार ?

    कहीं ऐसे चलते हैं स्कूल!क्या ऐसे होती है पढ़ाई!इस विद्यालय में यदि अधिकारी जी के अपने पिता जी का पैसा लगा होता तो क्या अधिकारी महोदय ऐसे ही चला लेते विद्यालय ?

     ऐसी परिस्थिति में शिक्षा का अधिकार जैसा कानून भी आखिर क्या कर लेगा जब शिक्षक लापरवाह होंगे अधिकारी कर्तव्य भ्रष्ट होंगे तो मुख्यमंत्री और प्रधान मंत्री तो स्कूल स्कूल दौड़े नहीं घूमेंगे!अधिकारियों को ही अपना नैतिक दायित्व समझते हुए शक्त  होना पड़ेगा!अन्यथा यदि स्कूलों में पढ़ाई ही नहीं होगी!तो क्या कर लेगा शिक्षा का अधिकार ?

      अधिकांश सरकारी प्राथमिक विद्यालयों की स्थिति यह है कि वहॉं शिक्षा के नाम पर केवल खाना पूर्ति हो रही है प्रायः विद्यालय साढ़े सात बजे खुलते हैं किंतु प्रायः आठ सवा आठ बजे तक अध्यापक पहुँच  पाते हैं विद्यालय। आपस में मिलते जुलते एवं आफिस में जाकर उपस्थिति का रजिस्टर लेते देते प्रधानाचार्य जी की खैर कुशल पूछते पूछते बीत जाता है बीत जाता है आधा पौना घंटा,कक्षा में पहुँचते पहुँचते नौ सवा नौ बज ही जाते हैं! बच्चों की किताब खोलकर उन्हें राइटिंग आदि लिखने को या किसी कापी किताब से कोई सवाल लिखने लगाने को बता दिया जाता है।इसी बीच साढ़े नौ बजे लंच हो जाता है जो साढे़ दस से ग्यारह बजे के बीच तक कहीं पूरा हो पाता है मुश्किल से ! इसके बाद बारी बारी से किसी न किसी शिक्षक को प्रतिदिन जरूरी काम लगा करता है और वह निकल जाता है इसीप्रकार बारी बारी से एक आध लोग प्रतिदिन बीमार होने के कारण चले जाते हैं उनको दवा लेने की जल्दी होती है इसलिए वो निकल जाते हैं।बारी बारी से कुछ शिक्षक शिक्षिकाएँ  छुट्टी की घोषणा करने को बैठे रहते हैं किंतु अभिभावकों को पहले ही समझाया जा चुका होता है कि साढ़े बारह बजे छुट्टी होनी है उसके एक मिनट बाद भी आपके बच्चे की हमारी कोई जिम्मेदारी नहीं है!इसलिए अपना बच्चा समय से ले जाना!अभिभावकों को भी चिंता रहती है कि कहीं हमारा बच्चा अकेला न छूट जाए इस बात से भयभीत अभिभावक बारह बजे से ही स्कूल में पहुँचने लगते हैं और अपना अपना बच्चा लेकर चले आते हैं।साढ़े बारह बजते बजते बिरले ही कुछ बच्चे बच जाते हैं बाकी जा चुके होते हैं।
    इस सारी प्रक्रिया में पढ़ने पढ़ाने का समय ही कब होता है?और पढ़ाता कौन है पढ़ता कौन है अब तो बच्चों के रिजल्ट का भी कोई झंझट नहीं है।शिक्षकों को भय किसका है?
     उपर्युक्त इन्हीं सब कारणों से सरकारी विद्यालयों में अपने बच्चे पढ़ाने वाले अभिभावक को लोग इतनी हिकारत की निगाह से देखने लगते हैं जैसे उसका अपने बच्चे से कोई लगाव ही न हो और वो समाज का सबसे गया गुजरा इंसान हो!सरकारी विद्यालयों में अपने बच्चे पढ़ाने वाले माता पिता का सामाजिक स्तर इतना गिर चुका होता है कि न वो बच्चे से पूछ पाते हैं कि वहॉं पढ़ाई क्या होती है न शिक्षकों से!दोनों का एक ही जवाब होता है कि यदि पढ़ाना ही था तो प्राइवेट विद्यालय में पढ़ा लेते!इसलिए माता पिता बच्चे को भेज आते हैं ले आते हैं इसके अलावा स्कूल वालों से वो कोई प्रश्न करें उनमें इतना साहस कहॉं होता है?क्या यही है शिक्षा का अधिकार ?

      इस बात के लिए किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं है कि सरकारी प्राथमिक विद्यालयों में पढ़ाई नहीं होती है लापरवाही का आलम यह है कि वहॉं का भोजन करके बच्चे न केवल बीमार होते हैं अपितु कई बार बच्चों के मर जाने तक की दुखद खबरें सुनाई पड़ती हैं!अभी अभी इस तरह दुर्घटनाओं ने तो सारे देश को हिलाकर रख दिया है!यह लगभग सबको पता है सरकारी प्राथमिक विद्यालयों में बच्चों और शिक्षकों के बीच कोई संबंध ही नहीं बन पाता है क्योंकि बच्चों और शिक्षकों की मुलाकातें ही इतनी कम हो पाती हैं अन्यथा बच्चे खराब भोजन संबंधी भी अपनी बात अध्यापकों को बता सकते थे!
    इसीलिए किसी से भी पूछ लिया जाए कि वह अपने बच्चे को सरकारी विद्यालय में क्यों नहीं पढ़ाता है वो सच सच बता देगा!आखिर किसी को शौक थोड़ा है कि वो अपने बच्चों को मोटी मोटी फीसें देकर प्राइवेट विद्यालयों  में पढ़ावे!              

      बाहर की बात क्या कही जाए दिल्ली के निगम से लेकर सरकारी प्राथमिक स्कूलों तक में पढ़ाई की यही स्थिति है इस विषय में कोई अधिकारी कर्मचारी नियंत्रण करने को तैयार ही नहीं है किसी की कोई जवाबदेही नहीं  होती है, क्या किसी भी अधिकारी का यह दायित्व नहीं बनता है कि वो अपने शिक्षकों से पूछे कि तुम्हारे स्कूलों का सम्मान प्राइवेट स्कूलों की अपेक्षा दिनों दिन घटता क्यों जा रहा है?किसी भी शिक्षण संस्थान की लोकप्रियता वहॉं के अध्यापकों के बात ब्यवहार और कर्तव्य परायणता पर निर्भर करती है!सरकारी प्राथमिक स्कूलों का सम्मान बढ़ाने की जिम्मेदारी आपकी है यदि घट रहा है तो यह जिम्मेदारी भी आपकी ही है!
     सरकारी शिक्षकों से  यह क्यों  नहीं पूछा जाना चाहिए कि आखिर आम जनता का विश्वास आप  क्यों नहीं जीत पा रहे हैं ?प्राइवेट स्कूलों के शिक्षकों की अपेक्षा क्या तुम कम पढ़े लिखे हो या तुम पढ़ा नहीं सकते!या उनसे आपकी शिक्षा कम है या आप ट्रेंड नहीं हैं या आपको सैलरी उनसे कम मिलती है! आखिर स्कूल की ड्यूटी देने और जिम्मेदारी निभाने में लापरवाही क्यों?इसके साथ साथ सरकारी शिक्षकों से यह भी पूछा जाना चाहिए कि यदि तुम्हारे यहाँ फीस या एडमीशन फीस भी नहीं ली जाती है भोजन भी बँटता है ऊपर से पैसे भी दिए जाते हैं।

    प्राइवेट स्कूलों के शिक्षकों की अपेक्षा आपकी  सैलरी भी कई गुना अधिक होती है यह किस बात की लेते हो तथा यह कहाँ से आती है?श्रीमान जी यह जनता की गाढ़ी कमाई में से टैक्स रूप में प्राप्त की गई धनराशि से पचासों हजार रुपए महीने की सैलरी तुम्हें दी जाती है!फिर भी असक्षम अभिभावक आर्थिक मजबूरी में अपने बच्चे को आपके यहाँ क्यों पढ़ाता है प्रसन्नता से क्यों नहीं?

    आपकी शिक्षा अधिक है आप ट्रेंड भी हैं फिर भी प्राइवेट स्कूलों से आप क्यों पिटते जा रहे हैं! आपकी उच्च शिक्षा एवं ट्रेंड होने का क्या लाभ हुआ समाज एवं सरकार को? सरकारी शिक्षकों से क्या यह भी नहीं पूछा जाना चाहिए कि आखिर आप लोगों के अपने बच्चे क्यों नहीं पढ़ते हैं सरकारी स्कूलों में ?यदि वो न मानें तो एक बार इस बात की ईमानदारी पूर्वक जाँच क्यों न करा ली जाए!

       फिर हाल कहा जा सकता है सरकारी स्कूलों में बच्चों की न तो पढ़ाई है और न ही किसी की जिम्मेदारी !भगवान भरोषे चल रहे हैं स्कूल!जनता के नाम पर जनता का पैसा सरकारी शिक्षकों को सरकारें उधर बाँटती जा रही हैं इधर मीडिया वालों को बताती जा रहीं हैं। 

                    करिए   भैया   खूब  प्रचार 

                    यह  है शिक्षा का अधिकार 

                    भोजन   बाँट  रही सरकार

                    सबके  सब   बच्चे  बीमार !

   पहले गृहस्थों को महात्मा एवं नौजवानों को अध्यापक ही संयम और सदाचार पूर्वक सच्चरित्रता की शिक्षा देते थे।साथ ही दुराचरणों की निंदा करते थे।अब निन्दा करने वालों के चारों तरफ   वही सब होता दिख रहा है, निन्दा किसकी कौन और क्यों करे?अध्यापक वर्ग की स्थिति यह है सरकारी प्राथमिक स्कूलों में पढ़ाई नहीं होती इस विषय में कोई अधिकारी कर्मचारी नियंत्रण करने को तैयार ही नहीं हैं क्या उसका यह दायित्व नहीं बनता!सरकारी शिक्षकों से पूछा जाना चाहिए कि यदि   तुम्हारे यहाँ भोजन भी बँटता है पैसे भी दिए जाते हैं।फीस या एडमीशन फीस भी नहीं ली जाती है और जनता की गाढ़ी कमाई में से टैक्स रूप में प्राप्त की गई धनराशि से सैलरी तुम्हें दी जाती है !उन शिक्षकों से  यह क्यों  नहीं पूछा जाना चाहिए कि आखिर आम जनता का विश्वास आप  क्यों नहीं जीत पा रहे हैं ?आखिर वो अपना आदर्श शिक्षकों को न मानें तो किसे मानें!जब शिक्षक ही काम चोर होंगे तो बच्चे कैसे होंगे ईमानदार ? प्राइवेट स्कूलों में हर कोई अपने बच्चे को पढ़ा नहीं सकता सरकारी स्कूलों में यदि पढ़ाई नहीं होगी तो खाली दिमाग कुछ भी कर सकता है!वह सहने के लिए समाज को हमेशा तैयार रहना होगा!इन बच्चों का भविष्य बिगाड़ने वाले शिक्षकों के साथ साथ समाज के वे लोग भी जिम्मेदार हैं जो ऐसा देखते हुए भी सह रहे हैं ।किसी कवि ने लिखा है कि 

    जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनका भी इतिहास।।

       

    राजेश्वरी प्राच्यविद्या शोध  संस्थान की अपील 

 संपर्क सूत्र-डॉ. एस. एन. वाजपेयी,09811226973

   यदि किसी को केवल रामायण ही नहीं अपितु ज्योतिष वास्तु आदि समस्त भारतीय  प्राचीन विद्याओं सहित  शास्त्र के किसी भी  पक्ष पर संदेह या शंका हो या कोई जानकारी  लेना चाह रहे हों।

     यदि ऐसे किसी भी प्रश्न का आप शास्त्र प्रमाणित उत्तर जानना चाहते हों या हमारे विचारों से सहमत हों या धार्मिक जगत से अंध विश्वास हटाना चाहते हों या धार्मिक अपराधों से मुक्त भारत बनाने एवं स्वस्थ समाज बनाने के लिए  हमारे राजेश्वरीप्राच्यविद्याशोध संस्थान के कार्यक्रमों में सहभागी बनना चाहते हों तो हमारा संस्थान आपके सभी शास्त्रीय प्रश्नोंका स्वागत करता है एवं आपका  तन,मन, धन आदि सभी प्रकार से संस्थान के साथ जुड़ने का आह्वान करता है। 

       सामान्य रूप से जिसके लिए हमारे संस्थान की सदस्यता लेने का प्रावधान  है।

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